Adhyay 11

Manusmriti

Shloka 230 Chapter Eleven

Adhyay 11
Shloka 230

Chapter Eleven

Subject: प्रायश्चित विषय

266 Shloka
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Adhyay 11 Shloka 230
Shloka
कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात्प्रमुच्यते। नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः॥

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Meaning
मनुष्य (पापं हि कृत्वा) पाप = अपराध करके (संतप्य) और उसके लिए पश्चात्ताप करके (तस्मात् पापात् प्रमुच्यते) उस पाप से छूट जाता है अर्थात् उस पाप को करने में पुनः प्रवृत्ति नहीं करता, और (पुनः एवं न कुर्यात्) 'फिर कभी इस प्रकार का कोई पाप नहीं करूंगा' (इति निवृत्त्या) इस प्रकार निश्चय करने के बाद पापों की ओर निवृत्ति होने से (सः तु पूयते) वह व्यक्ति पवित्राचरण वाला बन जाता है ॥२३०॥