Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 87 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 87

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
1/87
Adhyay 1 Shloka 87
Shloka
सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः। मुखबाहूरुपज्जानां पृथक्कर्माण्यकल्पयत्॥
Pada
सर्वस्य-अस्य। तु। सर्गस्य। गुप्ति-अर्थं। स। महा-द्युतिः। मुख-बाहु-ऊरु-पज्जानां। पृथक्कमण्यकल्पयत्।

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Subject
चारों वर्गों के कर्मों का निर्धारण
Meaning
(अस्य सर्वस्य सर्गस्य) इस [ ५ - ८० पर्यन्त श्लोकों में वर्णित ] समस्त संसार की (गुप्त्यर्थम्) गुप्ति अर्थात् सुरक्षा, व्यवस्था एवं समृद्धि के लिए (सः महाद्युतिः) महातेजस्वी परमात्मा ने (मुख-बाहु-ऊरु-पद्-जानाम्) मुख, बाहुं जघा और पैर की तुलना से निर्मितों के अर्थात् क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र वर्णों के (पृथक् कर्माणि अकल्पयत्) पृथक्-पृथक् कर्म बनाये॥८७॥