Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 75 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 75

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
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Adhyay 1 Shloka 75
Shloka
मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया। आकाशं जायते तस्मात्तस्य शब्दं गुणं विदुः॥
Pada
मनः। सृष्टिं। विकुरुते। चोद्यमानं। सिसृक्षया। आकाशं। जायते। तस्मात्। तस्य। शब्दं। गुणं। विदुः।

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Subject
पञ्चभूतों की उत्पत्ति का क्रम
Meaning
(सिसृक्षया) सृष्टि को रचने की इच्छा से फिर वह परमात्मा (मनः सृष्टिं विकुरुते) महत्तत्त्व रूप में विकृत करता है की सृष्टि को विकारी भाव में लाता है - अहंकार के (तस्मात्) उस विकारी अंश से (चोद्यमानं आकाशं जायते) प्रेरित हुआ-हुआ 'आकाश' उत्पन्न होता है (तस्य) उस आकाश का (गुणं शब्दं विदुः) गुरण 'शब्द' को मानते हैं ॥७५॥