Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 57 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 57

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
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Adhyay 1 Shloka 57
Shloka
एवं स जाग्रत्स्वप्नाभ्यां इदं सर्वं चराचरम्। संजीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्ययः॥
Pada
एवं। स। जाग्रत् - स्वप्नाभ्याम्। इदं। सर्वं। चर-अचरम्। संजीवयति। च-अजस्रं। प्रमापयति। च-अव्ययः।

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1 Bhashyas
Meaning
(सः अव्ययः) वह अविनाशी परमात्मा (एवम्) इस प्रकार [५१-५४ के अनुसार] (जाग्रत् स्वप्नाभ्याम्) जागने और सोने की अवस्थाओं के द्वारा (इदं सर्वं चर-अचरम्) इस समस्त जड़-चेतन जगत् को क्रमशः (अजस्रं सञ्जीवयति) प्रलयकाल तक निरन्तर जिलाता है (च) और फिर (प्रमापयति) मारता है अर्थात् काररण में लीन करता है॥५७॥