Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 53 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 53

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
1/53
Adhyay 1 Shloka 53
Shloka
तस्मिन्स्वपिति तु स्वस्थे कर्मात्मानः शरीरिणः। स्वकर्मभ्यो निवर्तन्ते मनश्च ग्लानिं ऋच्छति॥
Pada
तस्मिन्। स्वपिति। तु। स्वस्थे। कर्म-अत्मानः। शरीरिणः। स्वकर्मभ्यो। निवर्तन्ते। मनश्। च। ग्लानिम्। ऋच्चति।

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(सुस्थे) सृष्टि-कर्म से निवृत्त हुए (तस्मिन् स्वपिति तु) उस परमात्मा के सोने पर (कर्मात्मानः) कर्मों—–श्वास-प्रश्वास, चलना-सोना आदि कर्मों में लगे रहने का स्वभाव है जिनका, ऐसे (शरीरिण:) देहधारी जीव भी (स्वकर्मभ्यः, निवर्तन्ते) अपने-अपने कर्मों से निवृत्त हो जाते हैं (च) और (मनः) 'महत्' तत्त्व (ग्लानिम्) उदासीनता = सब कार्य-व्यापारों से विरत होने की अवस्था को या अपने कारण में लीन होने की अवस्था को (ऋच्छति) प्राप्त करता है ||५३||