Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 48 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 48

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
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Adhyay 1 Shloka 48
Shloka
गुच्छगुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः। बीजकाण्डरुहाण्येव प्रताना वल्ल्य एव च॥
Pada
गुच्च-गुल्मं। तु। विविधं। तथा-एव। तृणजातयः। बीज-काण्डरुहाण्येव। प्रताना। वल्ल्य। एव। च।

Bhashya

Subject
गुल्म, गुच्छ, तृण, प्रतान तथा बेलें
Meaning
(विविधम्) अनेक प्रकार के (गुच्छ) जड़ से गुच्छे के रूप में बनने वाले 'झाड़' आदि (गुल्मम्) एक जड़ से अनेक भागों में फूटने वाले 'ईख' आदि (तथैव) उसी प्रकार (तृगजातयः) घास की सब जातियां, (बीज-काण्डरुहाणि) बीज और शाखा से उत्पन्न होने वाले (प्रतानाः) उगकर फैलने वाली 'दूब' आदि (च) और (वल्ल्य:) उगकर किसी का सहारा लेकर चढ़ने वाली बेलें (एव) ये सब स्थावर भी 'उद्भिज्ज' कहलाते हैं॥४८ ।।