Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 31 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 31

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
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Adhyay 1 Shloka 31
Shloka
लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरुपादतः। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत्॥
Pada
लोकानां। तु। विवृद्धि-अर्थं। मुख-बाहु-ऊरु-पादतः। ब्राह्मणं। क्षत्रियं। वैश्यं। शूद्रं। च। निरवर्तयत्।

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Subject
चार वर्गों का निर्माण
Meaning
[फिर उस परमात्मा ने] (लोकानां तु) प्रजाओं अर्थात् समाज की (विबृद्धयर्थम्) विशेष वृद्धि = शान्ति, समृद्धि एवं प्रगति के लिए (मुखबाहुऊरु-पादतः) मुख, बाहु, जंघा और पैर की तुलना के अनुसार क्रमश: (ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं च शूद्रम्) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण को (निरवतंयत्) निर्मित किया ॥३१॥