Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 3 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 3

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
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Adhyay 1 Shloka 3
Shloka
त्वं एको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयंभुवः। अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो॥
Pada
त्वम्। एको। ह्यस्य। सर्वस्य। विधानस्य। स्वयंभुवः। अचिन्त्यस्य-अप्रमेयस्य। कार्यतत्त्वार्थवित्। प्रभो।

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Meaning
(हि) क्योंकि (प्रभो) हे भगवन् ! (अस्य सर्वस्य) इस सब प्रलय समय 'अचिन्त्यस्य अप्रमेस्य' अर्थात् अविज्ञ जगत् के 'कार्यतत्त्व' कारण से बने स्थूल पदार्थों के तत्त्व सूक्ष्म कारण प्रकृतिमय तत्त्वादि को आप जानते हैं। तथा (स्वयम्भुवः) स्वयम्भू जो सनातन (विधानस्य) विधानरूप वेद हैं (अचिन्त्यस्य) जिनमें असत्य कुछ भी नहीं अथवा जिनका चिन्तन से पार नहीं पाया जा सकता (अप्रमेयस्य) जिनमें सब अर्थात् अपरिमित सत्यविद्याओं का विधान है उनमें विहित और (अर्थवित्) उनके अर्थों को जानने वाले (एकः त्वम्) केवल आप ही हैं॥३॥