Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 15 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 15

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
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Adhyay 1 Shloka 15
Shloka
महान्तं एव चात्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च। विषयाणां ग्रहीतॄणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च॥
Pada
महान्तम्। एव। च-अत्मानं। सर्वाणि। त्रि-गुणानि। च। विषयाणां। ग्रहीतृणि। शनैः। पञ्च-इन्द्रियाणि। च।

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Subject
प्रकृति से महत् आदि तत्त्वों की उत्पत्ति
Meaning
(च) और फिर उस परमात्मा ने (आत्मनः एव) अपने आश्रय से अथवा स्वाश्रयस्थित प्रकृति से ही (सद्-असद्-प्रात्मकम) जो कारणरूप में विद्यमान रहे और विकारी अंश से कार्यरूप में जो अविद्यमान रहे, ऐसे स्वभाव वाले (मनः) 'महत्' नामक तत्त्व को (च) और (मनसः अपि) महत्तत्त्व से (अभिमन्तारम्) 'मैं हूँ' ऐसा अभिमान करने वाले (ईश्वरम) सामर्थ्यशाली (अहंकारम्) 'ग्रहंकार' नामक तत्त्व को (च) और फिर उससे (सर्वारिण त्रिगुणानि) सब त्रिगुरणात्मक पांच तन्मात्राओं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध को (च) तथा (आत्मानं एव. महान्तम्) आत्मोपकारक अथवा निरन्तरगमनशील 'मन' इन्द्रिय को (च) और (विषयाणां ग्रहीतरिंग) विषयों को ग्रहण करने वाली (पञ्चेन्द्रियाणि) दोनों वर्गों की पांचों ज्ञानेन्द्रियों— आंख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा एवं कर्मेन्द्रियोंहाथ, पैर, वाक्, उपस्थ, पायु को [ २ | ८६ - ९२] (शनैः) यथाक्रम से (उद्बबर्ह) उत्पन्न कर प्रकट किया॥१४, १५॥