Adhyay 1

Manusmriti

Shloka 108 Chapter One

Adhyay 1
Shloka 108

Chapter One

Subject: सृष्टि-उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय

144 Shloka
1/108
Adhyay 1 Shloka 108
Shloka
आचारः परमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च। तस्मादस्मिन्सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान्द्विजः॥
Pada
आचारः। परमो। धर्मः। श्रुति-उक्तः। स्मार्त। एव। च। तस्माद्। अस्मिन्। सदा। युक्तो। नित्यं। स्याद्। आत्मवान्। द्विजः।

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Subject
सदाचार की प्रधानता
Meaning
उपरोक्त श्लोक देकर स्वामी जी ने निम्न अर्थ दिया है - "कहने सुनने-सुनाने, पढ़ने-पढ़ाने का फल यही है कि जो वेद और वेदानुकूल स्मृतियों में प्रतिपादित धर्म का आचरण करना । इसलिये धर्माचार में सदा युक्त रहे।” (स० प्र० तृतीय समु०)" जो सत्य-भाषणादि कर्मों का आचरण करना है वही वेद और स्मृति में (श्रुत्युक्तः च स्मार्त एव) वेदों में कहा हुआ और स्मृतियों में भी कहा हुआ जो (आचार:) आचरण है (परम: धर्म:) वही सर्वश्रेष्ठ धर्म है (तस्मात्) इसीलिए (आत्मवान् द्विजः) आत्मोन्नति चाहने वाले द्विज को चाहिए कि वह (अस्मिन्) इस श्रेष्ठाचरण में (सदा नित्यं युक्तः स्यात्) सदा निरन्तर प्रयत्नशील रहे ॥१०८॥