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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 9/9/4

10 Sukta
22 Mantra
9/9/4
Devata- वामः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
को द॑दर्श प्रथ॒मं जाय॑मानमस्थ॒न्वन्तं॒ यद॑न॒स्था बिभ॑र्ति। भूम्या॒ असु॒रसृ॑गा॒त्मा क्व स्वि॒त्को वि॒द्वांस॒मुप॑ गा॒त्प्रष्टु॑मे॒तत् ॥

क: । द॒द॒र्श॒ । प्र॒थ॒मम् । जाय॑मानम् । अ॒स्थ॒न्ऽवन्त॑म् । यत् । अ॒न॒स्था। बिभ॑र्ति । भूम्या॑: । असु॑: । असृ॑क् । आ॒त्मा । क᳡ । स्वि॒त् । क: । वि॒द्वांस॑म् । उप॑ । गा॒त् । प्रष्टु॑म् । ए॒तत् ॥१४.४॥

Mantra without Swara
को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति। भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ॥

क: । ददर्श । प्रथमम् । जायमानम् । अस्थन्ऽवन्तम् । यत् । अनस्था। बिभर्ति । भूम्या: । असु: । असृक् । आत्मा । क । स्वित् । क: । विद्वांसम् । उप । गात् । प्रष्टुम् । एतत् ॥१४.४॥

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Meaning
कोई विरल व्यक्ति ही आत्मतत्त्व का द्रष्टा बनता है। शरीर में प्राण, रुधिर व आत्मा की स्थिति को समझने के लिए यह ज्ञानी के पास उपस्थित होता है।
Subject
को ददर्श प्रथम जायमानम् १. (क:) = [कामन:, क्रमणः, सुखी वा-निरु०] जो कामना करता है, क्रमण [पुरुषार्थ] करता है और परिणामतः सुखी होता है, वह विरल पुरुष ही (प्रथमं जायमानम्) = पहले से ही प्रादुर्भूत हुए-हुए [अजायमानो बहुधा विजायते] इस आत्मतत्त्व को (ददर्श) = देखता है। यह कितने आश्चर्य की बात है (यत्) = कि (अनस्था) = स्वयं अस्थिरहित होता हुआ यह (अस्थन्वन्तं बिभर्ति) = अस्थियों के पजरवाले इस शरीर को धारण करता है। २. (भूम्या:) = इस पार्थिव शरीररूप रथ का (असु:) = यह प्राण (असृक्) = रुधिर और आत्मा-रथी (क्वस्वित्) = भला कहाँ-कहाँ रहते हैं, इसप्रकार का प्रश्न उत्पन्न होते ही (क:) = वह ज्ञान की कामनावाला पुरुष (एतत् प्रष्टुम्) = इस बात को पूछने के लिए (विद्वांसम् उपगात्) = ज्ञानी पुरुष के समीप उपस्थित होता है।