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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 9/9/3

10 Sukta
22 Mantra
9/9/3
Devata- वामः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
इ॒मं रथ॒मधि॒ ये स॒प्त त॒स्थुः स॒प्तच॑क्रं स॒प्त व॑ह॒न्त्यश्वाः॑। स॒प्त स्वसा॑रो अ॒भि सं न॑वन्त॒ यत्र॒ गवां॒ निहि॑ता स॒प्त नामा॑ ॥

इ॒मम् । रथ॑म् । अधि॑ । ये । स॒प्त । त॒स्थु: । स॒प्तऽच॑क्रम् । स॒प्त । व॒ह॒न्ति॒ । अश्वा॑: । स॒प्त । स्वसा॑र: । अ॒भि । सम् । न॒व॒न्त॒ । यत्र॑ । गवा॑म् । निऽहि॑ता । स॒प्त । नाम॑ ॥१४.३॥

Mantra without Swara
इमं रथमधि ये सप्त तस्थुः सप्तचक्रं सप्त वहन्त्यश्वाः। सप्त स्वसारो अभि सं नवन्त यत्र गवां निहिता सप्त नामा ॥

इमम् । रथम् । अधि । ये । सप्त । तस्थु: । सप्तऽचक्रम् । सप्त । वहन्ति । अश्वा: । सप्त । स्वसार: । अभि । सम् । नवन्त । यत्र । गवाम् । निऽहिता । सप्त । नाम ॥१४.३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (इमं रथम् अधि) = इस शरीररूप रथ पर (ये) = जो (सप्त) = सात [सप् sip] ज्ञान-जल का आचमन करनेवाले सात ऋषि [दो कान, दो नासिका-छिद्र, दो आँखें व मुख] (तस्थू:) = स्थित हैं। ये (सप्त अश्वा:) = सात ऋषि-इन्द्रिय-अश्व (सप्तचक्रम्) = [सप्o know. to worship] श्रद्धारूपी चक्रोंवाले इस रथ को (वहन्ति) = धारण करते हैं, जीवन-मार्ग में आगे और आगे ले-चलते हैं। २. इस शरीर में (सप्त) = [सप् to obtain] सब शक्तियों को प्राप्त करानेवाले [सप् to do. to perform] या सब कार्यों को करनेवाले (स्वसार:) = [स्वयं सरणा:] अपने आप निरन्तर चलते रहनेवाले-हम सो जाते हैं तो भी ये चलते ही हैं [स्व: आदित्यः तेन सारिताः], अथवा सूर्य से प्रेरित होनेवाले [प्राण: प्रजानामुदयत्येष सूर्य:] ये प्राण इस शरीर को (अभिसंनवन्त) = [सम्यक् नवीकुर्वन्ति] प्रतिदिन इस शरीर-रथ को नया और नया [तरोताज़ा] कर देते हैं। यह शरीर रथ वह है, (यत्र) = जिसमें (गवां सप्त नामा निहिता) = [गो Diamond] 'रस, रुधिर, मांस, मेदस्, मज्जा, अस्थि व वीर्यरूप सात नामोंवाले रनों का स्थापन हुआ है। ये रस आदि ही शरीर को रमणीय बनाते हैं।
Essence
इस शरीर-रथ में सात ऋषियों की स्थिति है। आदरणीय [सात] चक्रोंवाले इस शरीर-रथ को सात इन्द्रियाश्व धारण करते हैं। सात प्राण इसे सदा नया बनाये रखते हैं। इसमें सात धातुओं का स्थापन हुआ है।
Subject
'सप्तचक्र' रथ का वर्णन