Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 21

Atharvaveda 9/9/21

10 Sukta
22 Mantra
9/9/21
Devata- वामः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
यस्मि॑न्वृ॒क्षे म॒ध्वदः॑ सुप॒र्णा नि॑वि॒शन्ते॒ सुव॑ते॒ चाधि॒ विश्वे॑। तस्य॒ यदा॒हुः पिप्प॑लं स्वा॒द्वग्रे॒ तन्नोन्न॑श॒द्यः पि॒तरं॒ न वेद॑ ॥

यस्मि॑न् । वृ॒क्षे । म॒धु॒ऽअद॑: । सु॒ऽप॒र्णा: । नि॒ऽवि॒शन्ते॑ । सुव॑ते । च॒ । अधि॑ । विश्वे॑ । तस्य॑ । यत् । आ॒हु॒: । पिप्प॑लम् । स्वा॒दु । अग्रे॑ । तत् । न । उत् । न॒श॒त् । य: । पि॒तर॑म् । न । वेद॑ ॥१४.२१॥

Mantra without Swara
यस्मिन्वृक्षे मध्वदः सुपर्णा निविशन्ते सुवते चाधि विश्वे। तस्य यदाहुः पिप्पलं स्वाद्वग्रे तन्नोन्नशद्यः पितरं न वेद ॥

यस्मिन् । वृक्षे । मधुऽअद: । सुऽपर्णा: । निऽविशन्ते । सुवते । च । अधि । विश्वे । तस्य । यत् । आहु: । पिप्पलम् । स्वादु । अग्रे । तत् । न । उत् । नशत् । य: । पितरम् । न । वेद ॥१४.२१॥

Meaning
१. (यस्मिन् वृक्षे) = विकृतिरूप जिस संसार-वृक्ष पर (मध्यदः सुपर्णा:) = [मधु: अदः] बड़े स्वाद से इस वृक्ष के फलों को भोगनेवाले व बड़े प्रयन से [सु] अपने पालन के लिए विविध भोगों को अपने भण्डार में पूरित करनेवाले जीव (निविशन्ते) = [निविश् to be attached to] अनुरक्ति व आसक्तिवाले हो जाते हैं (च) = और इस आसक्ति के कारण (विश्वे) = इसमें प्रविष्ट हुए हुए, अर्थात् उलझे हुए-हुए ये जीव (अधि सुवते) =खूब अधिकता से इन विषयरूप फलों का लाभ करते हैं [विषयान् लभन्ते-सा०]। २. (तस्य) = उस संसार-वृक्ष का (यत्) = जो (अग्रे स्वादु:) = स्वादिष्टों में अग्रगण्य (पिप्पलम्) = [मोक्षरूप] फल है, (तत्) = उस मोक्षरूप फल को (न उत् नशत्) = नहीं प्राप्त होता, (य:) = जोकि (पितरं न वेद) = इस वृक्ष पर ही रहनेवाले सब जीवों के रक्षक पिता को नहीं जानता।
Essence
प्रभु को जाननेवाला ही प्रभु की महिमा को समझकर उस परमानन्द की प्राप्ति की तुलना में इन भोगों की तुच्छता को समझता है तो इन भोगों के प्रति निर्विण्ण हो जाता है। प्रभु को जाने बिना मोक्ष-सुख सम्भव नहीं।
Subject
प्रभु का ज्ञान व मोक्ष-प्राप्ति

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.