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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 9/9/15

10 Sukta
22 Mantra
9/9/15
Devata- वामः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
स्त्रियः॑ स॒तीस्ताँ उ॑ मे पुं॒सः आ॑हुः॒ पश्य॑दक्ष॒ण्वान्न वि चे॑तद॒न्धः। क॒विर्यः पु॒त्रः स ई॒मा चि॑केत॒ यस्ता वि॑जा॒नात्स पि॒तुष्पि॒तास॑त् ॥

स्त्रिय॑: । स॒ती: । तान् । ऊं॒ इति॑ । मे॒ । पुं॒स: । आ॒हु॒: । पश्य॑त् । अ॒क्ष॒ण्ऽवान् । न । वि । चे॒त॒त् । अ॒न्ध: । क॒वि: । य: । पु॒त्र: । स: । ई॒म् । आ । चि॒के॒त॒ । य: । ता । वि॒ऽजा॒नात् । स: । पि॒तु: । पि॒ता । अ॒स॒त् ॥१४.१५॥

Mantra without Swara
स्त्रियः सतीस्ताँ उ मे पुंसः आहुः पश्यदक्षण्वान्न वि चेतदन्धः। कविर्यः पुत्रः स ईमा चिकेत यस्ता विजानात्स पितुष्पितासत् ॥

स्त्रिय: । सती: । तान् । ऊं इति । मे । पुंस: । आहु: । पश्यत् । अक्षण्ऽवान् । न । वि । चेतत् । अन्ध: । कवि: । य: । पुत्र: । स: । ईम् । आ । चिकेत । य: । ता । विऽजानात् । स: । पितु: । पिता । असत् ॥१४.१५॥

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Meaning
१. इन्द्रियाँ विषयों से मेल [संघात] के कारण 'स्त्रियः' कहाती हैं। [स्त्यै संघाते] । यास्क कहते हैं-('स्त्रिय एवैताः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धहारिण्यः') = शब्दादि विषयों का हरण करने से ये स्त्रियाँ ही हैं। ये ही इन्द्रियों संयत होने पर ज्ञानोपार्जन का साधन बनकर रक्षा करनेवाली होती है, अत: "पुमस्' [पा डुबसुन्] कहलाती हैं। एक संयमी पुरुष कहता है कि (स्त्रियः सती:) = स्त्री होते हुए (तान् उ) = उन इन्द्रियों को ही (मे) = मेरे लिए (पुंस: आहुः) = पुमान् कहते हैं। इसप्रकार इन्द्रियों की इस द्विरूपता को (पश्यत्) = देखनेवाला व्यक्ति ही (अक्षण्वान्) = उत्तम आँखोंवाला है, परन्तु जो (न विचेतत्) = इस द्विरूपता को नहीं समझता वह (अन्ध:) = अन्धा है। विषयों में ले जाकर, क्षणिक आनन्द के भोगों में फंसाकर ये हमें समाप्त भी कर सकती हैं और संयत होकर उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति का साधन होती हुई ये हमारी रक्षा करनेवाली भी हो सकती हैं। २. (य:) = जो (ईम्) = अब (आचिकेत) = इन इन्द्रियों के स्वरूप का सर्वथा अनुशीलन करके इन्हें समझ लेता है, (स:) = वह (कवि:) = ज्ञानी बनता है और (पुत्र:) = ज्ञान द्वारा अपना पवित्रीकरण करके अपना रक्षण करनेवाला होता है। (य:) = जो (ता:) = "स्त्रियः शब्द से कही गई इन इन्द्रियों को (विजानात्) = अच्छी प्रकार समझ लेता है, (स:) = वह (पितुः) = पिता (असत्) = पिता का भी पिता होता है, अर्थात् महान् रक्षक होता है। वह इन्द्रियों को विषयों में फंसने से रोककर उन्हें ज्ञान-प्राप्ति का साधन बनाता हुआ अपने जीवन को पवित्र करनेवाला होता है।
Essence
इन्द्रियाँ विषयासक्त करके हमारे संघात [विनाश] का भी कारण बनती है और ज्ञान-प्राप्ति का साधन होती हुई ये इन्द्रियों हमें पवित्र बनाती हैं। इनके स्वरूप को समझकर हम इनका ठीक प्रयोग करते हुए ज्ञान द्वारा अपना रक्षण करें।
Subject
पुत्र:-पितुः पिता