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Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 9/9/11

10 Sukta
22 Mantra
9/9/11
Devata- वामः, आदित्यः, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
पञ्चा॑रे च॒क्रे प॑रि॒वर्त॑माने॒ यस्मि॑न्नात॒स्थुर्भुव॑नानि॒ विश्वा॑। तस्य॒ नाक्ष॑स्तप्यते॒ भूरि॑भारः स॒नादे॒व न च्छि॑द्यते॒ सना॑भिः ॥

पञ्च॑ऽअरे । च॒क्रे । प॒रि॒ऽवर्त॑माने । यस्मि॑न् । आ॒ऽत॒स्थु: । भुव॑नानि । विश्वा॑ । तस्य॑ । न । अक्ष॑: । त॒प्य॒ते॒ । भूरि॑ऽभार: । स॒नात् । ए॒व । न । छि॒द्य॒ते॒ । सऽना॑भि: ॥१४.११॥

Mantra without Swara
पञ्चारे चक्रे परिवर्तमाने यस्मिन्नातस्थुर्भुवनानि विश्वा। तस्य नाक्षस्तप्यते भूरिभारः सनादेव न च्छिद्यते सनाभिः ॥

पञ्चऽअरे । चक्रे । परिऽवर्तमाने । यस्मिन् । आऽतस्थु: । भुवनानि । विश्वा । तस्य । न । अक्ष: । तप्यते । भूरिऽभार: । सनात् । एव । न । छिद्यते । सऽनाभि: ॥१४.११॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यह पृथिवीचक्र पाँच अरोंवाला है। इस भूमण्डल का पहला भाग भूमध्यरेखा के दोनों और २३*१/२ डिग्री तक 'उष्ण-कटिबन्ध' कहलाता है। २३*१/२ डिग्री से ६६*१/2 डिग्री तक उत्तर तथा दक्षिण में दो 'समशीतोष्ण-कटिबन्ध' कहलाते हैं तथा ६६x१/२ डिग्री से १० डिग्री तक दोनों ओर 'हिम-कटिबन्ध' हैं। इस (परिवर्तमाने) = अपनी कौली पर निरन्तर परिवृत्त होते हुए (पञ्चारे चक्रे) = पाँच अरोंवाले इस पृथिवीचक्र में (यस्मिन्) = जिसमें (विश्वा भुवनानि आतस्थुः) = सभी प्राणी स्थित हैं। (तस्य) = उस पृथिवीचक्र का (भूरिभार:) = पृथिवी के अनन्त-से बोझवाला (अक्ष:) = अक्ष [akle] (न तप्यते) = सन्तप्त नहीं होता। "कितना दृढ़ यह अक्ष है' यह सोचकर ही मनुष्य का सिर चकरा जाता है। यह चक्र (सनात्) = सदा से (सनाभि:) = समान नाभिवाला होता हुआ (एव) = भी (न छिद्यते) = छिन्न नहीं होता।
Essence
यह भूमण्डल का चक्र अपनी कीली पर निरन्तर घूम रहा है। यह पाँच भागों में बटा हुआ है। अनन्त बोझ से लदा हुआ इस पृथिवी का अक्ष सन्तप्त नहीं होता। समान नाभिवाला होता हुआ भी यह चक्र कभी छिन्न नहीं होता। 'पृथिवी च दृढा' यह नितान्त सत्य ही है।
Subject
भूगोल [The globe of our earth]