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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 9/7/5

10 Sukta
26 Mantra
9/7/5
Devata- गौः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- आर्च्यनुष्टुप् Suktam- गौ सूक्त
Mantra with Swara
श्ये॒नः क्रो॒डो॒न्तरि॑क्षं पाज॒स्यं बृह॒स्पतिः॑ क॒कुद्बृ॑ह॒तीः कीक॑साः ॥

श्ये॒न: । क्रो॒ड: । अ॒न्तर‍ि॑क्षम् । पा॒ज॒स्य᳡म् । बृह॒स्पति॑: । क॒कुत् । बृ॒ह॒ती: । कीक॑सा: ॥१२.५॥

Mantra without Swara
श्येनः क्रोडोन्तरिक्षं पाजस्यं बृहस्पतिः ककुद्बृहतीः कीकसाः ॥

श्येन: । क्रोड: । अन्तर‍िक्षम् । पाजस्यम् । बृहस्पति: । ककुत् । बृहती: । कीकसा: ॥१२.५॥

Meaning
१. (वायुः विश्वम्) = वायु उसके सब अवयव हैं। (स्वर्ग: लोक:) = स्वर्गलोक (कृष्णद्रम्) = आकर्षक गति है [कृष्ण हु], विधरणी लोकों को पृथक्-पृथक् स्थापित करनेवाली शक्ति (निवेष्यः) = उसका बैठने का कूल्हा है। २. (श्येन:) = श्येनयाग (क्रोड:) = उसका गोद-भाग है, (अन्तरिक्षम्) = अन्तरिक्ष (पाजस्यम्) = पेट है, (ब्रहस्पतिः ककुद्) = बृहस्पति उसका ककुद है। (बृहती:) = ये विशाल दिशाएँ (कीकसा:) = उसके गले के मोहरे हैं। ३. (देवानां पत्नी:) = 'सूर्या, इन्द्राणी, वरुणानी, अग्नाणी' आदि देवपलियाँ (पृष्टयः) = पृष्ठ के मोहरे, (उपसदः) = उपसद इष्टियाँ (पर्शवः) = उसकी पसलियाँ हैं।
Essence
वेदवाणी में प्रभु के बनाये हुए वायु आदि पदार्थों के ज्ञान के साथ कर्तव्यभूत उपसद आदि इष्टियों का भी प्रतिपादन किया गया है।
Subject
वायु से उपसद तक

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