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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 9/5/9

10 Sukta
38 Mantra
9/5/9
Devata- अजः पञ्चौदनः Rishi- भृगुः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- अज सूक्त
Mantra with Swara
अजा रो॑ह सु॒कृतां॒ यत्र॑ लो॒कः श॑र॒भो न च॒त्तोऽति॑ दु॒र्गाण्ये॑षः। पञ्चौ॑दनो ब्र॒ह्मणे॑ दी॒यमा॑नः॒ स दा॒तारं॒ तृप्त्या॑ तर्पयाति ॥

अज॑ । आ । रो॒ह॒ । सु॒ऽकृता॑म् । यत्र॑ । लो॒क: । श॒र॒भ: । न । च॒त्त: । अति॑ । दु॒:ऽगानि॑ । ए॒ष॒: । पञ्च॑ऽओदन: । ब्र॒ह्मणे॑ । दी॒यमा॑न: । स: । दा॒तार॑म् । तृप्त्या॑ । त॒र्प॒य॒ति॒ ॥५.९॥

Mantra without Swara
अजा रोह सुकृतां यत्र लोकः शरभो न चत्तोऽति दुर्गाण्येषः। पञ्चौदनो ब्रह्मणे दीयमानः स दातारं तृप्त्या तर्पयाति ॥

अज । आ । रोह । सुऽकृताम् । यत्र । लोक: । शरभ: । न । चत्त: । अति । दु:ऽगानि । एष: । पञ्चऽओदन: । ब्रह्मणे । दीयमान: । स: । दातारम् । तृप्त्या । तर्पयति ॥५.९॥

Meaning
१. हे (अज) = गति के द्वारा बुराई को परे फेंकनेवाले जीव ! तू (सुकृतां यत्र लोक:) = पुण्यकर्मा लोगों का जहाँ लोक है, वहाँ (आरोह) = आरोहण कर। तू (चत्त:) = [चति याचने, चत्तम् अस्य अस्तीति] याचना-प्रार्थनावाला होता हुआ (शरभः न) = [श् हिंसायाम्] शरभ के समान होता है-सब बुराइयों को शीर्ण करनेवाला होता है। ऐसा तू (दुर्गाणि अति एषः) = [इष् गतौ] सब दुर्गों को-कठिनाइयों को लांघ जाता है। २. यह (पञ्चौदनः) = पाँचों इन्द्रियों से ज्ञान-भोजन को प्राप्त करनेवाला जीव (ब्रह्मणे) = प्रभु के लिए (दीयमान:) = दिया जाता है-अर्पित होता है। (दातारम्) = अपने को प्रभु के लिए देनेवाले को (स:) = वे प्रभु (तृप्त्या तर्पयाति) = तृप्ति से प्राणित [आनन्दित] करते हैं। ('सम्प्राप्यैनमृषयो ज्ञानतमाः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः।') = [मुण्डकोपनिषत्]
Essence
हम क्रियाशीलता द्वारा बुराइयों को दूर करनेवाले बनकर पुण्यकर्मा लोगों के लोक में आरूढ़ हों। प्रार्थनामय जीवनवाले बनकर शरभ के समान शत्रुओं को शीर्ण करते हुए दुर्गों को लाँघ जाएँ। ज्ञान-प्राप्ति में लगकर अपने को प्रभु के प्रति अर्पित करें। इस अर्पण करनेवाले को प्रभु आनन्दविभोर कर देते हैं।

 
Subject
दुर्ग-लंघन

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