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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 9/5/3

10 Sukta
38 Mantra
9/5/3
Devata- अजः पञ्चौदनः Rishi- भृगुः Chhanda- चतुष्पदा पुरोऽतिशक्वरी जगती Suktam- अज सूक्त
Mantra with Swara
प्र प॒दोऽव॑ नेनिग्धि॒ दुश्च॑रितं॒ यच्च॒चार॑ शु॒द्धैः श॒फैरा क्र॑मतां प्रजा॒नन्। ती॒र्त्वा तमां॑सि बहु॒धा वि॒पश्य॑न्न॒जो नाक॒मा क्र॑मतां तृ॒तीय॑म् ॥

प्र । प॒द: । भव॑ । ने॒नि॒ग्धि॒ । दु:ऽच॑रितम् । यत् । च॒चार॑ । शु॒ध्दै: । श॒फै: । आ । क्र॒म॒ता॒म् । प्र॒ऽजा॒नन् । ती॒र्त्वा । तमां॑सि । ब॒हु॒ऽधा । वि॒ऽपश्य॑न् । अ॒ज: । नाक॑म् । आ । क्र॒म॒ता॒म् । तृतीय॑म् ॥५.३॥

Mantra without Swara
प्र पदोऽव नेनिग्धि दुश्चरितं यच्चचार शुद्धैः शफैरा क्रमतां प्रजानन्। तीर्त्वा तमांसि बहुधा विपश्यन्नजो नाकमा क्रमतां तृतीयम् ॥

प्र । पद: । भव । नेनिग्धि । दु:ऽचरितम् । यत् । चचार । शुध्दै: । शफै: । आ । क्रमताम् । प्रऽजानन् । तीर्त्वा । तमांसि । बहुऽधा । विऽपश्यन् । अज: । नाकम् । आ । क्रमताम् । तृतीयम् ॥५.३॥

Meaning
१. हे प्रभो! आप इस उपासक के (पदः) = पाँव से (दुश्चरितम्) = दुश्चरित को (प्र+अव+ नेनिग्धि) = प्रकर्षेण दूर थो डालिए, (यत् चचार) = जिस भी दोष को इसने किया है, उस सब दुश्चरित को इससे पृथक् कीजिए। अब यह (प्रजानन्) = प्रकृष्ट ज्ञानवाला होता हुआ (शुदैः शफै:) = [शम् शान्तिकरणे आलोचने च] पवित्र, शान्त विचारों के साथ (आक्रमताम्) = समन्तात् कार्यों में प्रवृत्त हो। २. यह (अज:) = गति के द्वारा मलों को परे फेंकनेवाला जीव (बहुधा विपश्यन्) = बहुत प्रकार से देखता हुआ—यह आलोचना करता हुआ कि उसका यह कार्य किसी की हानि का कारण तो न बनेगा-(तमांसि तीर्त्वा) = अज्ञान-अन्धकारों को तैरकर (तृतीयं नाकम्) = तृतीय प्रकृति व जीव से ऊपर परमात्मरूप-आनन्दमय मोक्षधाम में (आक्रमताम्) = विचरनेवाला हो।
Essence
प्रभुकृपा से हमारे पाँव दुश्चरित से सदा दूर रहें। हम सदा शान्त विचारों के साथ गति करें। अन्धकारों को तैरकर प्रकाशमय लोकों में विचरण करनेवाले बनें।
Subject
शुद्धैः शफैः

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