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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 9/4/5

10 Sukta
24 Mantra
9/4/5
Devata- ऋषभः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- ऋषभ सूक्त
Mantra with Swara
दे॒वानां॑ भा॒ग उ॑पना॒ह ए॒षो॒पां रस॒ ओष॑धीनां घृ॒तस्य॑। सोम॑स्य भ॒क्षम॑वृणीत श॒क्रो बृ॒हन्नद्रि॑रभव॒द्यच्छरी॑रम् ॥

दे॒वाना॑म् । भा॒ग: । उ॒प॒ऽना॒ह: । ए॒ष: । अ॒पाम् । रस॑: । ओष॑धीनाम् । घृ॒तस्य॑ । सोम॑स्य । भ॒क्षम् । अ॒वृ॒णी॒त॒ । श॒क्र: । बृ॒हन् । अद्रि॑: । अ॒भ॒व॒त् । यत् । शरी॑रम् ॥४.५॥

Mantra without Swara
देवानां भाग उपनाह एषोपां रस ओषधीनां घृतस्य। सोमस्य भक्षमवृणीत शक्रो बृहन्नद्रिरभवद्यच्छरीरम् ॥

देवानाम् । भाग: । उपऽनाह: । एष: । अपाम् । रस: । ओषधीनाम् । घृतस्य । सोमस्य । भक्षम् । अवृणीत । शक्र: । बृहन् । अद्रि: । अभवत् । यत् । शरीरम् ॥४.५॥

Meaning
१. वे प्रभु (देवानां भाग:) = दिव्यवृत्ति के सब पुरुषों से सेवनीय हैं [भज सेवायाम्]। (एष:) = यह (उपनाह:) = [नह बन्धने] संसार के सब पिण्डों को एक सूत्र में बाँधनेवाला है-सूत्रों का सूत्र है। (अपाम्) = जलों का, (ओषधीनाम्) = ओषधियों का (घृतस्य) = घृत का (रस:) = रस प्रभु ही हैं। २. (शक्रः) = वे शक्तिशाली प्रभु हम पुत्रों के लिए (सोमस्य भक्षम्) = सोम के भोजन को (अवृणीत) = वरते हैं, अर्थात् प्रभु हमारे लिए सौम्य भोजनों को ही नियत करते हैं। इस भोजन से (यत् शरीरम्) = जो यह शरीर है, वह (बृहन् अद्रि:) = एक बड़े पर्वत की भाँति (अभवत्) = हो जाता है। यह शरीर पत्थर के समान दृढ़ हो जाता है। सौम्य भोजनों से उत्पन्न शक्ति शरीर में सुरक्षित होती हुई शरीर को सुदृढ़ बनाती है।
Essence
प्रभु दिव्यवृत्तिवाले पुरुषों से उपासनीय हैं, सब लोकों को एक सूत्र में बाँधनेवाले हैं। जल, ओषधि व घृत में रसरूप में रह रहे हैं। सौम्य भोजनों के द्वारा हमारे शरीरों को सुदृढ़ बनाते हैं।
Subject
शरीरं बृहन् अद्रिः

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