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Atharvaveda - Mantra 19

Atharvaveda 9/4/19

10 Sukta
24 Mantra
9/4/19
Devata- ऋषभः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- ऋषभ सूक्त
Mantra with Swara
ब्रा॑ह्म॒णेभ्य॑ ऋष॒भं द॒त्त्वा वरी॑यः कृणुते॒ मनः॑। पुष्टिं॒ सो अ॒घ्न्यानां॒ स्वे गो॒ष्ठेऽव॑ पश्यते ॥

ब्रा॒ह्म॒णेभ्य॑: । ऋ॒ष॒भम् । द॒त्त्वा । वरी॑य: । कृ॒णु॒ते॒ । मन॑: । पुष्टि॑म् । स: । अ॒घ्न्याना॑म् । स्वे । गो॒ऽस्थे । अव॑ । प॒श्य॒ते॒ ॥४.१९॥

Mantra without Swara
ब्राह्मणेभ्य ऋषभं दत्त्वा वरीयः कृणुते मनः। पुष्टिं सो अघ्न्यानां स्वे गोष्ठेऽव पश्यते ॥

ब्राह्मणेभ्य: । ऋषभम् । दत्त्वा । वरीय: । कृणुते । मन: । पुष्टिम् । स: । अघ्न्यानाम् । स्वे । गोऽस्थे । अव । पश्यते ॥४.१९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (ब्राह्मणेभ्य:) = ब्रह्म-जिज्ञासुओं के लिए (ऋषभं दत्वा) = सर्वव्यापक व सर्वद्रष्टा प्रभु को प्रभु का ज्ञान देकर यह उपदेष्टा (मन: वरीयः कृणते) = अपने हृदय को विशाल [उदार] बनाता है। ज्ञान का आदान-प्रदान इन ज्ञानियों के मनों को उदार व पवित्र करता है। २. (स:) = वह ज्ञानोपदेष्टा (स्वे गोष्ठे) = अपने गोष्ट में [An assembly], अपनी सभाओं में (अध्यानाम्) = इन अहन्तव्य वेदवाणियों की (पुष्टिम्) = पुष्टि को (अवपश्यते) = देखता है। इनकी सभाओं में इन ज्ञान की वाणियों की ही चर्चा होती है और उस प्रकार इन्हीं का प्रसार होता है।
Essence
हम गोष्ठियों में अहन्तव्य वेदवाणियों की ही चर्चा करें। ब्रह्मज्ञान का आदान प्रदान करते हुए विशाल व पवित्र हृदयोंवाले बनें।
Subject
ऋषभ-दान