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Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 9/4/17

10 Sukta
24 Mantra
9/4/17
Devata- ऋषभः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ऋषभ सूक्त
Mantra with Swara
शृङ्गा॑भ्यां॒ रक्ष॑ ऋष॒त्यव॑र्तिं हन्ति॒ चक्षु॑षा। शृ॒णोति॑ भ॒द्रं कर्णा॑भ्यां॒ गवां॒ यः पति॑र॒घ्न्यः ॥

शृङ्गा॑भ्याम् । रक्ष॑: । ऋ॒ष॒ति॒ । अव॑र्तिम् । ह॒न्ति॒ । चक्षु॑षा । शृ॒णोति॑ । भ॒द्रम् । कर्णा॑भ्याम् । गवा॑म् । य: । पति॑: । अ॒घ्न्य: ॥४.१७॥

Mantra without Swara
शृङ्गाभ्यां रक्ष ऋषत्यवर्तिं हन्ति चक्षुषा। शृणोति भद्रं कर्णाभ्यां गवां यः पतिरघ्न्यः ॥

शृङ्गाभ्याम् । रक्ष: । ऋषति । अवर्तिम् । हन्ति । चक्षुषा । शृणोति । भद्रम् । कर्णाभ्याम् । गवाम् । य: । पति: । अघ्न्य: ॥४.१७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.(य:) = जो भी (गवां पति:) वेदवाणियों का स्वामी बनता है, वह (अघ्न्य:) = विषय-वासनाओं से अहन्तव्य होता है। यह वैषयिक वृत्तियोंवाला नहीं बनता। (कर्णाभ्यां भद्रं शृणोति) = कानों से भद्र को ही सुनता है। यह निन्दा की बातों को सुनने में रुचि नहीं लेता। (शृंगाभ्याम्) = [शृणाति] शरीरस्थ दोषों को विनष्ट करनेवाले प्राणापानरूप शृंगों से (रक्ष:) = सब रोगकृमियों को (ऋषति) = नष्ट कर देता है तथा (चक्षुषा) = ज्ञानदृष्टि से (अवर्ति हन्ति) = दौर्भाग्य [bad fortune, poverty, distress, want] को दूर भगाता है।
Essence
वेदवाणियों का अध्येता 'विषयों में नहीं फँसता, कानों से सदा शुभ सुनता है, प्राणसाधना द्वारा रोगकृमियों का विनाश करता है तथा ज्ञानदृष्टि से दीर्भाग्य को दूर करता है।
Subject
वेदज्ञान व सुन्दर जीवन