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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 9/4/15

10 Sukta
24 Mantra
9/4/15
Devata- ऋषभः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ऋषभ सूक्त
Mantra with Swara
क्रो॒ड आ॑सीज्जामिशं॒सस्य॒ सोम॑स्य॒ क॒लशो॑ धृ॒तः। दे॒वाः सं॒गत्य॒ यत्सर्व॑ ऋष॒भं व्यक॑ल्पयन् ॥

क्रो॒ड: । आ॒सी॒त् । जा॒मि॒ऽशं॒सस्य॑ । सोम॑स्य । क॒लश॑: । धृ॒त: । दे॒वा: । स॒म्ऽगत्य॑ । यत् । सर्वे॑ । ऋ॒ष॒भम् । वि॒ऽअक॑ल्पयन् ॥४.१५॥

Mantra without Swara
क्रोड आसीज्जामिशंसस्य सोमस्य कलशो धृतः। देवाः संगत्य यत्सर्व ऋषभं व्यकल्पयन् ॥

क्रोड: । आसीत् । जामिऽशंसस्य । सोमस्य । कलश: । धृत: । देवा: । सम्ऽगत्य । यत् । सर्वे । ऋषभम् । विऽअकल्पयन् ॥४.१५॥

Meaning
१. ब्रह्मा प्रभु के विराट् शरीर की कल्पना इसप्रकार करता है कि उस विराद पुरुष के (पार्श्वे) = दोनों पार्श्व (अनुमत्याः आस्ताम्) = अनुमति के हैं-एक कला से हीन पूर्णिमा के चाँद के हैं [कलाहीने सानुमतिः] (अनूवृजौ) = पसलियों के दोनों भाग (भगस्य आस्ताम्) = सूर्य के हैं। (मित्रः इति अब्रवीत) = प्राणवायु ने यह कहा है कि उस विराट् के (एतौ अष्ठीवन्तौ) = ये घुटने तो (केवलौ मम) = केवल मेरे ही हैं। २. (भसत्) = प्रजनन भाग (आदित्यानाम् आसीत्) = आदित्यों का है, (श्रोणी) = कटि के दोनों भाग (बृहस्पते: आस्ताम्) = बृहस्पति के हैं, (पुच्छम्) = पुच्छ भाग (देवस्य वातस्य) = दिव्य गुणयुक्त वायु का है। (तेन) = वायुनिर्मित पुच्छ से वह (ओषधी: धूनोति) = सब ओषधियों को कम्पित करता है। ३. (गुदा:) = गुदा की नाड़ियाँ (सिनीवाल्याः आसन्) = सिनीवाली [सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली] जिसमें चन्द्रमा की एक कला प्रादुर्भूत हो रही है, उस अमावस की हैं, (त्वचम्) = त्वचा को (सूर्यायाः अब्रुवन्) = सूर्या का [सूर्या-The daughter of the sun-उषा] उषा का कहते हैं। (ऋषभम्) = उस सर्वव्यापक व सर्वद्रष्टा प्रभु को (यत् अकल्पयन्) = जब विराट् पुरुष के रूप में कल्पित किया-सोचा गया तो (पदः) = उसके पाँवों को (उत्थातुः अब्रुवन्) = उत्थाता [प्राण का] कहा गया। ४. (जामिशंसस्य) = सब जगत् को उत्पन्न करनेवाले, मातृरूप प्रभु का शंसन करनेवाले की वे (क्रोडः आसीत्) = गोद है। यह भक्त सदा मातृरूप प्रभु की गोद में आनन्दित होता है। यह प्रभु तो (सोमस्य कलश:) = सोम का-आनन्दरस का कलश ही (धृत:) = धारण किया गया है। (यत्) = जब (सर्वे देवा:) = सब देव (संगत्य) = मिलकर (ऋषभम्) = उस सर्वव्यापक प्रभु को (व्यकल्पयन्) = एक विराट् पुरुष के रूप में कल्पित करते हैं, तब उपर्युक्त प्रकार से ब्रह्मा द्वारा उस प्रभु के अङ्गों का प्रतिपादन होता है।
Essence
ब्रह्माण्ड के सब पिण्ड उस विराट् पुरुष के विविध अङ्गों के रूप में है।
Subject
विराट् प्रभु का दर्शन

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