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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 9/3/30

10 Sukta
31 Mantra
9/3/30
Devata- शाला Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- एकावसाना त्रिपदा प्रतिष्ठा गायत्री Suktam- शाला सूक्त
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शः शाला॑या॒ नमो॑ महि॒म्ने स्वाहा॑ दे॒वेभ्यः॑ स्वा॒ह्येभ्यः ॥

ऊ॒र्ध्वाया॑: । दि॒श: शाला॑या: । नम॑: । म॒हि॒म्ने । स्वाहा॑ । दे॒वेभ्य॑: । स्वा॒ह्ये᳡भ्य: ॥३.३०॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वाया दिशः शालाया नमो महिम्ने स्वाहा देवेभ्यः स्वाह्येभ्यः ॥

ऊर्ध्वाया: । दिश: शालाया: । नम: । महिम्ने । स्वाहा । देवेभ्य: । स्वाह्येभ्य: ॥३.३०॥

Meaning
१. (शालाया:) = इस शाला की (प्राच्याः दिश:) = पूर्व दिशा से (महिने नमः) = उस प्रभु की महिमा के लिए हम नतमस्तक हों और साथ ही (स्वाहोभ्य:) = [सु आह] उत्तम शब्द बोलने योग्य-प्रशस्य (देवेभ्यः) = देववृत्ति के विद्वान् पुरुषों के लिए (स्वाहा) = हम प्रशस्त शब्दों को कहें विद्वानों का समुचित आदर करें। २. इसी प्रकार (शालाया:) = शाला की दक्षिण दिशा से, (प्रतीच्याः दिश:) = पश्चिम दिशा से (उदिच्याः दिश:) = उत्तर दिशा (ध्रुवायाः दिश:) =  ध्रुव [नीचे की] दिशा से (ऊर्ध्वाया: दिश:) = ऊर्ध्वा दिक् से तथा (दिश:दिशः) = सब दिशाओं-प्रदिशाओं से हम उस प्रभु की महिमा के लिए नतमस्तक हों और प्रशंसनीय देवों के लिए प्रशंसा के शब्दों को कहें।
Essence
हमारे घरों में सर्वत्र प्रभु की महिमा के प्रति नमन हो तथा वन्दनीय विद्वानों का उचित समादर हो।
Subject
प्रभु-नमन-देववन्दन
Special
विशेष-घर में ब्रह्म की महिमा के प्रति सदा नतमस्तक होता हुआ तथा देववन्दन करता हुआ यह उन्नत होता हुआ 'ब्रह्मा' बनता है। यही अगले सूक्त का ऋषि है। यह ऋषभ नाम से प्रभु-स्तवन करता है

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