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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 9/3/22

10 Sukta
31 Mantra
9/3/22
Devata- शाला Rishi- भृग्वङ्गिराः Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- शाला सूक्त
Mantra with Swara
प्र॒तीचीं॑ त्वा प्रती॒चीनः॒ शाले॒ प्रैम्यहिं॑सतीम्। अ॒ग्निर्ह्यन्तराप॑श्च॒र्तस्य॑ प्रथ॒मा द्वाः ॥

प्र॒तीची॑म् । त्वा॒ । प्र॒ती॒चीन॑: । शाले॑ । प्र । ए॒मि॒ । अहिं॑सतीम् । अ॒ग्नि: । हि । अ॒न्त: । आप॑: । च॒ । ऋ॒तस्य॑ । प्र॒थ॒मा । द्वा: ॥३.२२॥

Mantra without Swara
प्रतीचीं त्वा प्रतीचीनः शाले प्रैम्यहिंसतीम्। अग्निर्ह्यन्तरापश्चर्तस्य प्रथमा द्वाः ॥

प्रतीचीम् । त्वा । प्रतीचीन: । शाले । प्र । एमि । अहिंसतीम् । अग्नि: । हि । अन्त: । आप: । च । ऋतस्य । प्रथमा । द्वा: ॥३.२२॥

Meaning
१. हे (शाले) = गृह ! (प्रतीचीम्) = मेरे सम्मुख स्थित हुई-हुई (अहिंसतीम्) = किसी भी प्रकार से हिंसन न करती हुई (त्वा) = तेरे प्रति (प्रतीचीन:) = मुख किये हुए आता हुआ (प्र एमि) = तुझे प्राप्त होता हूँ। (अन्तः हि) = तेरे अन्दर निश्चय से (अग्नि: आपः च) = अग्नि और जल-दोनों ही तत्त्व विद्यमान हैं जोकि (ऋतस्य) = यज्ञ के (प्रथमा द्वा:) = मुख्य द्वार हैं। प्रत्येक यज्ञ की सिद्धि के लिए 'अग्नि और जल' आवश्यक है।
Essence
हम अनुकूल परिस्थितिवाले घरों को प्राप्त हों। इन घरों में रोगादि से किसी भी प्रकार हमारा हिंसन न हो। घरों में 'अग्नि और जल' दोनों तत्त्व सुलभ हों, क्योंकि इन्हीं के द्वारा सब यज्ञ सिद्ध होंगे।
Subject
अग्नि: आपः

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