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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 9/2/7

10 Sukta
25 Mantra
9/2/7
Devata- कामः Rishi- अथर्वा Chhanda- जगती Suktam- काम सूक्त
Mantra with Swara
अध्य॑क्षो वा॒जी मम॒ काम॑ उ॒ग्रः कृ॒णोतु॒ मह्य॑मसप॒त्नमे॒व। विश्वे॑ दे॒वा मम॑ ना॒थं भ॑वन्तु॒ सर्वे॑ दे॒वा हव॒मा य॑न्तु म इ॒मम् ॥

अधि॑ऽअक्ष: । वा॒जी । मम॑ । काम॑: । उ॒ग्र: । कृ॒णोतु॑ । मह्य॑म् । अ॒स॒प॒त्नम् । ए॒व । विश्वे॑ । दे॒वा: । मम॑ । ना॒थम् । भ॒व॒न्तु॒ । सर्वे॑ ।दे॒वा: । हव॑म् । आ । य॒न्तु॒ । मे॒ । इ॒मम् ॥२.७॥

Mantra without Swara
अध्यक्षो वाजी मम काम उग्रः कृणोतु मह्यमसपत्नमेव। विश्वे देवा मम नाथं भवन्तु सर्वे देवा हवमा यन्तु म इमम् ॥

अधिऽअक्ष: । वाजी । मम । काम: । उग्र: । कृणोतु । मह्यम् । असपत्नम् । एव । विश्वे । देवा: । मम । नाथम् । भवन्तु । सर्वे ।देवा: । हवम् । आ । यन्तु । मे । इमम् ॥२.७॥

Meaning
१. (मम) = मेरे (अध्यक्ष:) = सब कामों का द्रष्टा प्रभु (वाजी) = शक्तिशाली है, (काम:) = कमनीय है, (उग्र:) = शत्रुओं के लिए भयंकर है। ये प्रभु (मह्यम्) = मेरे लिए (असपत्नम्) = शत्रुराहित्य को (एव) = ही (कृणोतु) = करें। प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न बनकर मैं 'काम-क्रोधादि' सब शत्रुओं को कुचलनेवाला बनूं। २. (विश्वेदेवा:) = सब दिव्य गुण (मम नाथं भवन्तु) = मेरे रक्षक व मेरा ऐश्वर्य हों। काम के विनाश के लिए मेरा जीवन पवित्र प्रेम से परिपूर्ण हो, क्रोधविनाश से मेरा हृदय करुणा से आप्लावित हो। लोभ को नष्ट करके मैं त्याग की वृत्तिवाला बनूं। ऐसा होने पर (सर्वे देवा:) = सब देववृत्ति के पुरुष (मे इमं इवम्) = मेरी इस पुकार को सुनकर (आयन्तु) = मुझे प्राप्त हों। देवों का सम्पर्क मुझे भी देव बनाए।
Essence
प्रभु की उपासना से मैं शक्ति-सम्पन्न [वाजी, उग्र] बनकर 'काम-क्रोध-लोभ' रूप शत्रुओं को विनष्ट करूं। इन्हें विनष्ट करके मैं 'प्रेम, करुणा व त्याग' को अपनाऊँ। देवों के सम्पर्क में मैं देव बनूँ।
Subject
'वाजी उग्रः' काम:

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