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Atharvaveda - Mantra 6

Atharvaveda 9/10/6

10 Sukta
28 Mantra
9/10/6
Devata- गौः, विराट्, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
गौर॑मीमेद॒भि व॒त्सं मि॒षन्तं॑ मू॒र्धानं॒ हिङ्ङ॑कृणोन्मात॒वा उ॑। सृक्वा॑णं घ॒र्मम॒भि वा॑वशा॒ना मिमा॑ति मा॒युं पय॑ते॒ पयो॑भिः ॥

गौ: । अ॒मी॒मे॒त् । अ॒भि । व॒त्सम् । मि॒षन्त॑म् । मू॒र्धान॑म् । हिङ् । अ॒कृ॒णो॒त् । मात॒वै । ऊं॒ इति॑ । सृका॑णम् । घ॒र्मम् । अ॒भि । वा॒व॒शा॒ना । मिमा॑ति । मा॒युम् । पय॑ते । पय॑:ऽभि: ॥१५.६॥

Mantra without Swara
गौरमीमेदभि वत्सं मिषन्तं मूर्धानं हिङ्ङकृणोन्मातवा उ। सृक्वाणं घर्ममभि वावशाना मिमाति मायुं पयते पयोभिः ॥

गौ: । अमीमेत् । अभि । वत्सम् । मिषन्तम् । मूर्धानम् । हिङ् । अकृणोत् । मातवै । ऊं इति । सृकाणम् । घर्मम् । अभि । वावशाना । मिमाति । मायुम् । पयते । पय:ऽभि: ॥१५.६॥

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Meaning
१. (गौ:) = यह वेदवाणीरूप गौ (मिषन्तम्) = [मिष 10 look at] ध्यान से देखते हुए (वत्सम् अभि) = उच्चारण करनेवाले के प्रति (अमीमेत) = शब्द करती है-बोलती है। यदि हम इस वेदवाणी को ध्यान से देखेंगे और इसे पढ़ेंगे तो यह हमारे प्रति बोलेगी, अर्थात् यह हमें अवश्य समझ में आएगी। यह वेदमाता ध्यान से पढ़नेवाले के (मूर्धानम्) = मस्तिष्क को (हिंकृणोत्) = ज्ञान की किरणों से जगमग कर देती है [रश्मयो वै हिंकारः] । इसलिए इसके मस्तिष्क को ज्ञानपूर्ण करती है कि मातवा उ-यह उत्तम ज्ञानी बनकर निर्माण का कार्य कर सके। २. (सृक्वाणम्) = [सज उत्पन्न करना] उत्पादक (घर्मम्) = तेज को (अभिवावशाना) = पाठक के लिए चाहती हुई, यह वेदवाणी अपने पाठक को (मायुम्) = [माया-ज्ञान] ज्ञानवाला (मिमाति) = बनाती है। एवं, वेदज्ञ विद्वान् ध्वंस के साधनों को नहीं अपितु निर्माण के लिए उपयोगी वस्तुओं को ही आविष्कृत करता है। इसप्रकार यह वेदवाणी (पयोभिः) = अपने ज्ञानरूपी दुग्ध से (पयते) = अपने पाठक को आप्यायित करती है। यदि व्यक्ति इस वेदवाणी का ध्यान से पाठ करता है, तो यह उसका प्रतिफल ज्ञानरूप दूध से देती है।
Essence
यदि हम वेदवाणी को ध्यान से पढ़ेंगे तो यह अवश्य समझ में आएगी। समझ में आने पर यह हमें निर्माण में प्रवृत्त करेगी। इस प्रवृत्ति के साथ हममें उत्पादन की शक्ति भी होगी और हम उत्पादन-शक्ति से इस संसार को अवश्य सुन्दर बना पाएँगे।
Subject
गौः, अमीमेत्