Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 11

Atharvaveda 9/10/11

10 Sukta
28 Mantra
9/10/11
Devata- गौः, विराट्, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
अप॑श्यं गो॒पाम॑नि॒पद्य॑मान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम्। स स॒ध्रीचीः॒ स विषू॑ची॒र्वसा॑न॒ आ व॑रीवर्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः ॥

अप॑श्यम् । गो॒पाम् । अ॒नि॒ऽपद्य॑मानाम् । आ । च॒ । परा॑ । च॒ । प॒थिऽभि॑: । चर॑न्तम् । स: । स॒ध्रीची॑: । स: । विषू॑ची: । वसा॑न: । आ । व॒री॒व॒र्ति॒ । भुव॑नेषु । अ॒न्त: ॥१५.११॥

Mantra without Swara
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्। स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः ॥

अपश्यम् । गोपाम् । अनिऽपद्यमानाम् । आ । च । परा । च । पथिऽभि: । चरन्तम् । स: । सध्रीची: । स: । विषूची: । वसान: । आ । वरीवर्ति । भुवनेषु । अन्त: ॥१५.११॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. (गोपाम्) = इन्द्रियों की रक्षा करनेवाले को (अनिपद्यमानम्) = फिर-फिर विविध योनियों में नीचे न गिरते हुए को (अपश्यम्) = मैंने देखा है। जितेन्द्रियता द्वारा मुक्त हुए-हुए इस पुरुष को आ च परा च-समीप और दूर-हमारी ओर आनेवाले व हमसे दूर जानेवाले (पथिभिः) = मार्गों से (चरन्तम्) = विचरण करते हुए को मैंने देखा है। जहाँ हम हैं, वहाँ भी आता है, और हमसे दूर अन्य लोक-लोकान्तरों में भी जाता है। २.(स:) = वह मुक्तात्मा लोकहित के लिए (सध्रीची:) = [सह अञ्चति] जिन शरीरों से हमारे साथ उठता-बैठता है, उन शरीरों को (वसान:) = धारण करने के स्वभाववाला होता है। इन शरीरों से हमें उपदेश देता हुआ अपने जन्म-धारण के उद्देश्य को पूरा करता है। (सः विषूची:) = वह चारों ओर विविध लोकों में जानेवाले शरीरों को भी धारण करता है। इसप्रकार यह समय-समय पर शरीर धारण करता हुआ (भुवनेषु अन्तः) = इन भुवनों में (आवरीवर्ति) = चारों ओर फिर-फिर आवर्तनवाला होता है। लोकहित के लिए जन्म लेनेवाले ये पुरुष ही 'अतिमानव' व महापुरुष हुआ करते हैं।
Essence
पूर्ण जितेन्द्रिय पुरुष मुक्त हो जाता है। यह समय-समय पर शरीर धारण करके लोकहित के लिए भुवनों में विचरण करता है।
Subject
लोकहित के लिए शरीर-धारण