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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 9/10/1

10 Sukta
28 Mantra
9/10/1
Devata- गौः, विराट्, अध्यात्मम् Rishi- ब्रह्मा Chhanda- जगती Suktam- आत्मा सूक्त
Mantra with Swara
यद्गा॑य॒त्रे अधि॑ गाय॒त्रमाहि॑तं॒ त्रैष्टु॑भं वा॒ त्रैष्टु॑भान्नि॒रत॑क्षत। यद्वा॒ जग॒ज्जग॒त्याहि॑तं प॒दं य इत्तद्वि॒दुस्ते अ॑मृत॒त्वमा॑नशुः ॥

यत् । गा॒य॒त्रे । अधि॑ । गा॒य॒त्रम् । आऽहि॑तम् । त्रैस्तु॑भम् । वा॒ । त्रैस्तु॑भात् । नि॒:ऽअत॑क्षत । यत् । वा॒ । जग॑त् । जग॑ति । आऽहि॑तम् । प॒दम् । ये । इत् । तत् । वि॒दु: । ते । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ॒न॒शु॒: ॥१५.१॥

Mantra without Swara
यद्गायत्रे अधि गायत्रमाहितं त्रैष्टुभं वा त्रैष्टुभान्निरतक्षत। यद्वा जगज्जगत्याहितं पदं य इत्तद्विदुस्ते अमृतत्वमानशुः ॥

यत् । गायत्रे । अधि । गायत्रम् । आऽहितम् । त्रैस्तुभम् । वा । त्रैस्तुभात् । नि:ऽअतक्षत । यत् । वा । जगत् । जगति । आऽहितम् । पदम् । ये । इत् । तत् । विदु: । ते । अमृतऽत्वम् । आनशु: ॥१५.१॥

Meaning
१. पहली बात यह है (यत्) = कि (गायत्रे) = यज्ञ में [गायत्रो वै यज्ञः-गो०पू० ४.२४] (गायत्रम्) = पुरुष [गायत्रो वै पुरुषः-ए० ४.३] (अधि आहितम्) = अधीन करके रक्खा गया है। पुरुष का जीवन यज्ञ पर आश्रित है। यज्ञ के अभाव में पुरुष नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा। (अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः') = यह यज्ञ ही भुवन का केन्द्र है। २. (वा) = और (त्रैष्टुभात) = त्रिवेद-विद्या के स्तवन के द्वारा अपने में 'ज्ञान, कर्म व उपासना'-इन तीनों को स्थिर करने के द्वारा (त्रैष्टुभ निरतक्षत) = अपने जीवन को तीनों सुखों से सम्बद्ध किया करते हैं। ज्ञानपूर्वक कर्मों को करने के द्वारा प्रभ के उपासन से आध्यात्मिक, आधिभौतिक व आधिदैविक'-इन तीनों तापों से निवृत्त होकर [त्रिष्टुभ] मानव जीवन तीन सुखों से सम्बद्ध होता है। [त्रैष्टुभः त्रिभिः सुखैः सम्बद्धः-द०, त्रिवेदविद्यास्तवनेन-द०]। ३. तीसरी बात यह है (यत्) = कि (वै) = निश्चय से जगत्-सर्वत्र गतिवाला (पदम्) = मुनियों से जाए जाने योग्य वह प्रभु (जगति आहितम्) = सारे ब्रह्माण्ड में-कण-कण में आहित हैं। (ये) = जो (इत्) = निश्चय से (तत् विदुः) = उस कण-कण में वर्तमान प्रभु को जानते हैं, (ते) = वे (अमृतत्वम् आनशुः) = मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
Essence
मोक्ष को वे ही प्राप्त करते हैं जोकि यह समझ लेते हैं कि १. यज्ञ में ही पुरुष का जीवन निहित है, २. ज्ञान, कर्म व उपासना का समन्वय ही त्रिविध दुःखों को रोकता है तथा ३. वे गतिशील मुनियों से गम्य प्रभु ब्रह्माण्ड के कण-कण में विद्यमान हैं।

 
Subject
तीन बातों को समझना

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