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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 9/1/7

10 Sukta
24 Mantra
9/1/7
Devata- मधु, अश्विनौ Rishi- अथर्वा Chhanda- अतिजागतगर्भा यवमध्या महाबृहती Suktam- मधु विद्या सूक्त
Mantra with Swara
स तौ प्र वे॑द॒ स उ॒ तौ चि॑केत॒ याव॑स्याः॒ स्तनौ॑ स॒हस्र॑धारा॒वक्षि॑तौ। ऊर्जं॑ दुहाते॒ अन॑पस्पुरन्तौ ॥

स: । तौ । प्र । वे॒द॒ । स: । ऊं॒ इति॑ । तौ । चि॒के॒त॒ । यौ । अ॒स्या॒: । स्तनौ॑ । स॒हस्र॑ऽधारौ । अक्षि॑तौ । ऊर्ज॑म् । दु॒हा॒ते॒ इति॑ । अन॑पऽस्फुरन्तौ ॥१.७॥

Mantra without Swara
स तौ प्र वेद स उ तौ चिकेत यावस्याः स्तनौ सहस्रधारावक्षितौ। ऊर्जं दुहाते अनपस्पुरन्तौ ॥

स: । तौ । प्र । वेद । स: । ऊं इति । तौ । चिकेत । यौ । अस्या: । स्तनौ । सहस्रऽधारौ । अक्षितौ । ऊर्जम् । दुहाते इति । अनपऽस्फुरन्तौ ॥१.७॥

Meaning
१. इस मधुकशा [वेदधेनु] के दो स्तन हैं। एक स्तन प्रकृति का ज्ञानदुग्ध देता है तो दूसरा आत्मतत्व का ज्ञानदुग्ध प्राप्त कराता है। (यौ) = जो (अस्याः) = इस वेदधेनु के (स्तनौ) = ज्ञानदुग्ध देनेवाले स्तन हैं, वे (सहस्त्रधारौ) = हज़ारों प्रकार से हमारा धारण करनेवाले हैं और (अक्षितौ) = हमें क्षीण न होने देनेवाले हैं। ये स्तन हममें (ऊर्जं दुहाते) = बल व प्राणशक्ति का प्रपूरण करते है तथा (अनपस्फुरन्तौ) = [स्फुर सञ्चलने, riot refusing to be milked] सदा ज्ञानदुग्ध देनेवाले हैं। २. (य:) = वह गतमन्त्र का 'सुमेधा ब्रह्मा' ही (तौ प्रवेद) = वेदधेनु के उन स्तनों को प्रकर्षेण जाननेवाला है, (उ) = और (स:) = वह ही (तौ चिकेत) = उनमें निवास करता है अथवा उनसे ज्ञानदुग्ध प्राप्त करता है।
Essence
वेदधेन के दोनों स्तन हमें ज्ञान देकर हजारों प्रकार से हमारा धारण करते हैं। वे हमें क्षीण नहीं होने देते, हममें बल व प्राणशक्ति का प्रपूरण करते हैं, सदा ज्ञानदुग्ध देते हैं। सुमेधा ब्रह्मा ही इन्हें जानता है और इनसे ज्ञानदुग्ध प्राप्त करता है।
Subject
'सहस्रधारौ अक्षितौ' स्तनौ

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