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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 9/1/5

10 Sukta
24 Mantra
9/1/5
Devata- मधु, अश्विनौ Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- मधु विद्या सूक्त
Mantra with Swara
मधोः॒ कशा॑मजनयन्त दे॒वास्तस्या॒ गर्भो॑ अभवद्वि॒श्वरू॑पः। तं जा॒तं तरु॑णं पिपर्ति मा॒ता स जा॒तो विश्वा॒ भुव॑ना॒ वि च॑ष्टे ॥

मधो॑: । कशा॑म् । अ॒ज॒न॒य॒न्त॒ । दे॒वा: । तस्या॑: । गर्भ॑: । अ॒भ॒व॒त् । वि॒श्वऽरू॑प: । तम् । जा॒तम् । तरु॑णम् । पि॒प॒र्ति॒ । मा॒ता । स: । जा॒त: । व‍िश्वा॑ । भुव॑ना । वि । च॒ष्टे॒ ॥१.५॥

Mantra without Swara
मधोः कशामजनयन्त देवास्तस्या गर्भो अभवद्विश्वरूपः। तं जातं तरुणं पिपर्ति माता स जातो विश्वा भुवना वि चष्टे ॥

मधो: । कशाम् । अजनयन्त । देवा: । तस्या: । गर्भ: । अभवत् । विश्वऽरूप: । तम् । जातम् । तरुणम् । पिपर्ति । माता । स: । जात: । व‍िश्वा । भुवना । वि । चष्टे ॥१.५॥

Meaning
१. (देवा:) = देववृत्ति के पुरुष (मधो: कशाम् अजनयन्त) = मधुविद्या की कशा [वेदवाणी] को अपने में प्रादुर्भूत करते हैं, इनके हृदयों में वेदवाणी का प्रकाश होता है। (तस्याः) = उस वेदवाणी का (गर्भ:) = ग्रहण (विश्वरूपः अभवत्) = सब पदार्थों का निरूपण करनेवाला होता है। २. (माता) = यह वेदमाता (तम्) = वेदवाणी के धारण करनेवाले (जातम्) = प्रादुर्भूत शक्तियोंवाले तथा (तरुणम्) = वासनाओं को तैरनेवाले को (पिपर्ति) = पालित व पूरित करती है। वेद का धारण इस व्यक्ति को विकसित शक्तियोंवाला व वासनाओं को तैरनेवाला बनाता है। (स:) = वह (जात:) = प्रादुर्भूत शक्तियोंवाला व्यक्ति (विश्वा भुवना विचष्टे) = सब प्राणियों को देखता है-सबका ध्यान करता है।
Essence
देववृत्ति के व्यक्तियों के हृदयों में वेदवाणी का प्रकाश होता है। इससे वे सब पदार्थों के तत्त्वज्ञान को प्राप्त करते हैं। उनकी शक्तियों का विकास होता है। वे वासनाओं को तैरनेवाले होते हैं और सब प्राणियों का ध्यान करते हैं।
Subject
जात+तरुण

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