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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 9/1/4

10 Sukta
24 Mantra
9/1/4
Devata- मधु, अश्विनौ Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- मधु विद्या सूक्त
Mantra with Swara
मा॒तादि॒त्यानां॑ दुहि॒ता वसू॑नां प्रा॒णः प्र॒जाना॑म॒मृत॑स्य॒ नाभिः॑। हिर॑ण्यवर्णा मधुक॒शा घृ॒ताची॑ म॒हान्भर्ग॑श्चरति॒ मर्त्ये॑षु ॥

मा॒ता । आ॒दित्याना॑म् । दु॒हि॒ता । वसू॑नाम् । प्रा॒ण: । प्र॒ऽजाना॑म् । अ॒मृत॑स्य । नाभि॑: । हिर॑ण्यऽवर्णा । म॒धु॒ऽक॒शा। घृ॒ताची॑ । म॒हान् । भर्ग॑: । च॒र॒ति॒ । मर्त्ये॑षु ॥१.४॥

Mantra without Swara
मातादित्यानां दुहिता वसूनां प्राणः प्रजानाममृतस्य नाभिः। हिरण्यवर्णा मधुकशा घृताची महान्भर्गश्चरति मर्त्येषु ॥

माता । आदित्यानाम् । दुहिता । वसूनाम् । प्राण: । प्रऽजानाम् । अमृतस्य । नाभि: । हिरण्यऽवर्णा । मधुऽकशा। घृताची । महान् । भर्ग: । चरति । मर्त्येषु ॥१.४॥

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Meaning
१. यह (मधुकशा) = वेदवाणी (आदित्यानां माता) = आदित्यों की प्रकृति, जीव व परमात्मा' के ज्ञान को अपने अन्दर लेनेवालों की निर्मात्री है। इसका अध्येता सब ज्ञानों का अपने अन्दर उपादान करता है, क्योंकि यह सब विद्याओं का भण्डार तो है ही। यह (वसूनां दुहिता) = निवास के लिए आवश्यक सब तत्वों को प्रपूरिका है-यह शरीर को स्वस्थ, मन को निर्मल व मस्तिष्क को दीप्त करती है। यह वेदवाणी वस्तुतः (प्रजानां प्राण:) = प्रजाओं का प्राण ही है-सब प्रजाओं को प्राणशक्ति-सम्पन्न करती है। वेदवाणी हमें विलास से दूर करके विनाश से बचाती है। इसप्रकार यह (अमृतस्य नाभि:) = अमृत का केन्द्र है-हममें अमृतत्व को बाँधनेवाली है [णह बन्धने]। २. (हिरण्यवर्णा) = हित-रमणीय ज्ञानों का वर्णन करनेवाली है, (घृताची) = मल-क्षरण व ज्ञान-दीति को प्राप्त करानेवाली है [धू क्षरणदीप्त्योः ]। यह मधुकशा महान् (भर्ग:) = महनीय तेज है-महनीय प्रभु का प्रकाश है, यह (मर्त्येषु चरति) = मानवों के निमित्त-मानवमात्र के हित के लिए गतिवाली होती है। यह मधुकशा मनुष्य को ठीक ज्ञान देती हुई, कर्तव्य-मार्ग का दर्शन कराती हुई, उसका कल्याण करती है।
Essence
वेदवाणी आदित्यों की माता है, वसुओं की दुहिता, प्रजाओं का प्राण व अमृत की नाभि है। यह हिरण्यवर्णा, घृताची, मधुकशा एक महान् तेज है, जो मानवमात्र के हित में प्रवृत्त है।
Subject
हिरण्यवर्णा मधुकशा