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Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 9/1/14

10 Sukta
24 Mantra
9/1/14
Devata- मधु, अश्विनौ Rishi- अथर्वा Chhanda- पुरउष्णिक् Suktam- मधु विद्या सूक्त
Mantra with Swara
मधु॑ जनिषीय॒ मधु॑ वंशिषीय। पय॑स्वानग्न॒ आग॑मं॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा ॥

मधु॑ । ज॒नि॒षी॒य॒ । मधु॑ । वं॒शि॒षी॒य॒ । पय॑स्वान् । अ॒ग्ने॒ । आ । अ॒ग॒म॒म् । तम् । मा॒ । सम् । सृ॒ज॒ । वर्च॑सा ॥१.१४॥

Mantra without Swara
मधु जनिषीय मधु वंशिषीय। पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा ॥

मधु । जनिषीय । मधु । वंशिषीय । पयस्वान् । अग्ने । आ । अगमम् । तम् । मा । सम् । सृज । वर्चसा ॥१.१४॥

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Meaning
१. (मधु जनिषीय) = मैं अपने जीवन में सोम का रक्षण करता हुआ वर्चस्वी बनकर मधु को ही प्रादुर्भूत करूँ, अर्थात् सदा मधुर शब्द ही बोलू, (मधु वंशिषीय) = मधु की हो याचना करूँ, अर्थात् मेरा स्वभाव मधुर ही हो। हे अग्ने अग्रणी प्रभो! मैं (पयस्वान्) = प्रशस्त ज्ञानदुग्धवाला व शक्तियों को बढ़ानेवाला होकर (आगमम्) = आपके समीप प्राप्त होता हूँ। (तं मा) = उस मुझे आप (वर्चसा संसृज) = वर्चस् से युक्त कीजिए। वर्चस्वी बनकर ही मैं मधुर बन पाऊँगा।
Essence
मैं जीवन में मधुर शब्द ही बोलूँ, मधुरता की ही याचना करूँ। मैं शक्तियों को आप्यायित करके प्रभु को प्राप्त होऊँ, प्रभु मुझे वर्चस्वी बनाएँ।
Subject
मधु जनिषीय, मधु वंशिषीय