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Atharvaveda - Mantra 24

Atharvaveda 8/9/24

10 Sukta
26 Mantra
8/9/24
Devata- कश्यपः, समस्तार्षच्छन्दांसि, ऋषिगणः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विराट् सूक्त
Mantra with Swara
केव॒लीन्द्रा॑य दुदु॒हे हि गृ॒ष्टिर्वशं॑ पी॒यूषं॑ प्रथ॒मं दुहा॑ना। अथा॑तर्पयच्च॒तुर॑श्चतु॒र्धा दे॒वान्म॑नु॒ष्याँ॒ असु॑रानु॒त ऋषी॑न् ॥

केव॑ली । इन्द्रा॑य । दु॒दु॒हे । हि । गृ॒ष्टि: । वश॑म् । पी॒यूष॑म् । प्र॒थ॒मम् । दुहा॑ना । अथ॑ । अ॒त॒र्प॒य॒त् । च॒तुर॑: । च॒तु॒:ऽधा: । दे॒वान् । म॒नु॒ष्या᳡न् । असु॑रान् । उ॒त । ऋषी॑न् ॥९.२४॥

Mantra without Swara
केवलीन्द्राय दुदुहे हि गृष्टिर्वशं पीयूषं प्रथमं दुहाना। अथातर्पयच्चतुरश्चतुर्धा देवान्मनुष्याँ असुरानुत ऋषीन् ॥

केवली । इन्द्राय । दुदुहे । हि । गृष्टि: । वशम् । पीयूषम् । प्रथमम् । दुहाना । अथ । अतर्पयत् । चतुर: । चतु:ऽधा: । देवान् । मनुष्यान् । असुरान् । उत । ऋषीन् ॥९.२४॥

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Meaning
१. वेदवाणी 'केवली' है [के+वल] आनन्दमय प्रभु में विचरण करनेवाली है। यह (इन्द्राय दुदुहे) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिए दुही जाती है। (हि) = निश्चय से (गृष्टि:) = यह वेदवाणीरूप (सकृत प्रसूता गौ) = सृष्टि के प्रारम्भ में जिसका एक बार ही ज्ञान दे दिया जाता है, वह वेदधेनु (वशम्) = कमनीय-चाहने योग्य, (प्रथमम्) = सर्वोत्कृष्ट व विस्तृत (पीयूषम्) = ज्ञानामृत का (दुहाना) = प्रपूरण करती है। २. (अथ) = अब यह (देवान् मनुष्यान् असुरान् उत ऋषीन्) = देव, मनुष्य, असुर और ऋषि इन (चतुः) = चारों को (चतुर्धा अतर्पयत्) = चार प्रकार से तृप्त करती है। ब्रह्मचर्याश्रम में विचरनेवाले-ज्ञान की स्पर्धा में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की भावनावाले विजिगीषु [दिव् विजिगीषायाम्] ब्रह्मचारियों को प्रकृतिज्ञान [ऋग्वेद द्वारा] देती हुई प्रीणित करती है। गृहस्थ में मननपूर्वक कर्म करनेवाले मनुष्यों को [यजुर्वेद के द्वारा] कर्तव्य-कर्मों का उपदेश देती हुई तृप्त करती है। अब प्राणसाधना में प्रवृत्त [असुषु रमन्ते] वानप्रस्थों को [सामवेद द्वारा] प्रभु के उपासन में प्रवृत्त करती हुई आनन्दित करती है तथा अन्तत: सब वासनाओं का संहार करनेवाले ऋषिभूत संन्यासियों को यह ब्रह्मवेद [अथर्ववेद] के द्वारा ब्रह्म के समीप प्राप्त कराती है, तब यह संन्यस्त वाचस्पति बनकर नीरोग व निर्द्वन्द्व बनता है-लोगों को भी यह ऐसा बनने का ही उपदेश करता है।
Essence
प्रभु के द्वारा सृष्टि के आरम्भ में जिसका ज्ञान दिया गया है, वह वेदवाणी हमें "कमनीय, व्यापक, अमृतमय ज्ञान प्रास कराती है। यह हमें 'देव, मनुष्य, असुर [प्राणसाधक] व ऋषि' बनाती हुई सफल जीवनवाला करती है।
Subject
देव, मनुष्य, असुर, ऋषि