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Atharvaveda - Mantra 20

Atharvaveda 8/9/20

10 Sukta
26 Mantra
8/9/20
Devata- कश्यपः, समस्तार्षच्छन्दांसि, ऋषिगणः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विराट् सूक्त
Mantra with Swara
क॒थं गा॑य॒त्री त्रि॒वृतं॒ व्याप क॒थं त्रि॒ष्टुप्प॑ञ्चद॒शेन॑ कल्पते। त्र॑यस्त्रिं॒शेन॒ जग॑ती क॒थम॑नु॒ष्टुप्क॒थमे॑कविं॒शः ॥

क॒थम् । गा॒य॒त्री । त्रि॒ऽवृत॑म् । वि । आ॒प॒ । क॒थम् । त्रि॒ऽस्तुप् । प॒ञ्च॒ऽद॒शेन॑ । क॒ल्प॒ते॒ । त्र॒य॒:ऽत्रिं॒शेन॑ । जग॑ती। क॒थम् । अ॒नु॒ऽस्तुप् । क॒थम् । ए॒क॒ऽव‍िं॒श: ॥९.२०॥

Mantra without Swara
कथं गायत्री त्रिवृतं व्याप कथं त्रिष्टुप्पञ्चदशेन कल्पते। त्रयस्त्रिंशेन जगती कथमनुष्टुप्कथमेकविंशः ॥

कथम् । गायत्री । त्रिऽवृतम् । वि । आप । कथम् । त्रिऽस्तुप् । पञ्चऽदशेन । कल्पते । त्रय:ऽत्रिंशेन । जगती। कथम् । अनुऽस्तुप् । कथम् । एकऽव‍िंश: ॥९.२०॥

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Meaning
१. (कथम्) = किस अद्भुत प्रकार से (गायत्री) = [गयाः प्राणाः, तान् तत्रे] प्राणों का रक्षण (त्रिवृतं व्याप) = [त्रिषु ज्ञानकर्मोपासनेषु वर्तते] ज्ञान, कर्म व उपासना में प्रवृत्त पुरुष को व्याप्त करता है। जो भी ज्ञान, कर्म व उपासना में प्रवृत्त होगा, वह प्राणशक्ति का रक्षण कर पाएगा। (कथम्) = किस अद्धत प्रकार से (त्रिष्टुप) = काम, क्रोध, लोभ का निरोध [त्रिष्टुप्] (पञ्चदशेन कल्पते) = [आत्मा पञ्चदश: तां० १९।११।३] आत्मा को सामर्थ्यवाला बनाता है। वस्तुत: 'काम, क्रोध, लोभ' का निरोध ही आत्मा को शक्तिशाली बनाता है। २. (त्रयस्त्रिंशेन) = तेतीस देवों को अपने में स्थापित करनेवाले साधक से (कथम्) = कैसे अद्भुत रूप में (जगती) = लोकहित का कार्य होता है, और (अनुष्टुप्) = प्रतिदिन प्रभुस्तवन करनेवाला (कथम्) = कैसे (एकविंश:) = 'पाँच भूत, पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय तथा इक्कीसवें सशक्त मन' वाला होता है। स्तोता के ये इक्कीस के-इक्कीस तत्त्व बड़े ठीक रहते हैं, अतएव वह पूर्ण स्वस्थ होता है।
Essence
'ज्ञान, कर्म व उपासन' में प्रवृत्त होकर हम प्राणों का रक्षण करें; काम, क्रोध, लोभ का निरोध करके आत्मा को प्रबल बनाएँ: अपने में दिव्य गुणों को धारण करके लोकहित में प्रवृत्त हों तथा प्रभुस्तवन करते हुए हम जीवन के धारक इक्कीस तत्वों को अपने में ठीक रक्खें।
Subject
गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, अनुष्टुप्