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Atharvaveda - Mantra 18

Atharvaveda 8/9/18

10 Sukta
26 Mantra
8/9/18
Devata- कश्यपः, समस्तार्षच्छन्दांसि, ऋषिगणः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विराट् सूक्त
Mantra with Swara
स॒प्त होमाः॑ स॒मिधो॑ ह स॒प्त मधू॑नि स॒प्तर्तवो॑ ह स॒प्त। स॒प्ताज्या॑नि॒ परि॑ भू॒तमा॑य॒न्ताः स॑प्तगृ॒ध्रा इति॑ शुश्रुमा व॒यम् ॥

स॒प्त । होमा॑: । स॒म्ऽइध॑: । ह॒ । स॒प्त । मधू॑नि । स॒प्त । ऋ॒तव॑: । ह॒ । स॒प्त । स॒प्त । आज्या॑नि । परि॑ । भू॒तम् । आ॒य॒न् । ता: । स॒प्त॒ऽगृ॒ध्रा: । इति॑ । शु॒श्रु॒म॒ । व॒यम् ॥९.१८॥

Mantra without Swara
सप्त होमाः समिधो ह सप्त मधूनि सप्तर्तवो ह सप्त। सप्ताज्यानि परि भूतमायन्ताः सप्तगृध्रा इति शुश्रुमा वयम् ॥

सप्त । होमा: । सम्ऽइध: । ह । सप्त । मधूनि । सप्त । ऋतव: । ह । सप्त । सप्त । आज्यानि । परि । भूतम् । आयन् । ता: । सप्तऽगृध्रा: । इति । शुश्रुम । वयम् ॥९.१८॥

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Meaning
१. ('सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे') = शरीर में सात ऋषि रक्खे गये हैं। इन ऋषियों के द्वारा इस जीवन में (सप्त होमा:) = सात होम सदा चलते हैं ('येन यज्ञस्तायते सप्तहोता')। इन यज्ञों से उत्पन्न होनेवाली (समिधः) = दीसियों भी (ह) = निश्चय से (सप्त) = सात हैं। इन दीसियों के साथ (मधूनि सप्त) = सात माधुर्यों की जीवन में उत्पत्ति होती है और (ऋतवः ह सम) = सात ही नियमित गतियाँ [ऋगतौ] होती हैं। २. वस्तुतः (सप्त आग्यानि) = सात जीवन को अलंकृत व दीप्त बनाने के साधन (भूतं परि आयन्) = प्राणि को प्राप्त हुए हैं। (ता:) = वे ही (सम्म गधा:) = सात गिद्ध हो जाते हैं, (इति वयं शभ्रमः) = ऐसा हमने सुना है। प्रभु ने दो कान, दो नासिका-छिद्र, दो आँखें व मुखरूप सात ऋषि हमारे शरीर में रक्खे हैं। ये सात ऋषि हैं। ये ज्ञान का ग्रहण करते हुए जीवन को अलंकृत कर देते हैं, परन्तु जब हम विषयों से आकृष्ट होकर विषयों की ओर चले जाते हैं तब ये 'सात गृध्र' हो जाते हैं। जीवन को अलंकृत करने के स्थान में विषय-पङ्क से उसे मलिन कर डालते हैं।
Essence
प्रभु की व्यवस्था से कानों, नासिका छिद्रों, आँखों व मन' द्वारा जीवन में सात होम चलते हैं। इनके द्वारा जीवन 'दीस, मधुर व नियमित गति' वाला बनता है। ये सात जीवन को दीस करने के साधन विषयाकृष्ट होकर 'सप्त गृध्र' बन जाते हैं-विषय-तृष्णा से बद्ध होकर ये जीवन को मलिन कर देते हैं।
Subject
सप्त आज्यानि व सप्त गृध्रा: