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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 8/9/13

10 Sukta
26 Mantra
8/9/13
Devata- कश्यपः, समस्तार्षच्छन्दांसि, ऋषिगणः Rishi- अथर्वा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- विराट् सूक्त
Mantra with Swara
ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मनु॑ ति॒स्र आगु॒स्त्रयो॑ घ॒र्मा अनु॒ रेत॒ आगुः॑। प्र॒जामेका॒ जिन्व॒त्यूर्ज॒मेका॑ रा॒ष्ट्रमेका॑ रक्षति देवयू॒नाम् ॥

ऋ॒तस्य॑ । पन्था॑म् । अनु॑ । ति॒स्र: । आ । अ॒गु॒: । त्रय॑: । ध॒र्मा: । अनु॑ । रेत॑: । आ । अ॒गु॒: । प्र॒ऽजाम् । एका॑ । जिन्व॑ति । ऊर्ज॑म् । एका॑ । रा॒ष्ट्रम् । एका॑ । र॒क्ष॒ति॒ । दे॒व॒ऽयू॒नाम् ॥९.१३॥

Mantra without Swara
ऋतस्य पन्थामनु तिस्र आगुस्त्रयो घर्मा अनु रेत आगुः। प्रजामेका जिन्वत्यूर्जमेका राष्ट्रमेका रक्षति देवयूनाम् ॥

ऋतस्य । पन्थाम् । अनु । तिस्र: । आ । अगु: । त्रय: । धर्मा: । अनु । रेत: । आ । अगु: । प्रऽजाम् । एका । जिन्वति । ऊर्जम् । एका । राष्ट्रम् । एका । रक्षति । देवऽयूनाम् ॥९.१३॥

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Meaning
१. (ऋतस्य पन्थाम् अनु) = ऋत के [ठीक समय व ठीक स्थान पर कार्य करने के] मार्ग पर चलने के पश्चात् (तिस्त्र:) =  [तिस्रो देवीर्मयो भुव:-'इडा सरस्वती मही'] तीन कल्याणकर दिव्य भावनाएँ 'इडा, सरस्वती और मही [भारती]'(आगु:) = प्राप्त होती हैं। 'इडा' प्रभु स्तवन की वाणी है, 'सरस्वती' विद्या है तथा 'मही वा भारती' शरीर का उचित भरण है। इन देवियों का आराधन मनुष्य को वासनाओं के आक्रमण से बचाकर शरीर में रेतस् के रक्षण के योग्य बनाता है। (रेत: अनु) = रेतस् का रक्षण होने पर (प्रयः धर्मा:) = तीन यज्ञ-देवपूजा, संगतिकरण व दान (आगु:) = मानव-जीवन में प्राप्त होते हैं। २. (एका) = पूर्वोक्त तीन देवियों में से एक 'इडा' प्रभु की स्तुतिवाणी (प्रजा जिन्वती) = प्रजा को उत्तम प्रेरणा [to impel] प्राप्त कराती है। घर में माता-पिता को प्रभुस्तवन में प्रवृत्त देखकर सन्तानों को उत्तम प्रेरणा मिलती है। (एका) = एक 'सरस्वती' (ऊर्जं) [जिन्वती] = शरीर में बल व प्राणशक्ति का सञ्चार करती है। (एका) = एक 'मही'-शरीरों के उचित पोषण की वृत्तिवाले (देवयूनाम्) = दिव्य गुणों को अपने साथ जोड़ने की कामनावाले युवकों के सहारे (राष्ट्रं रक्षति) = राष्ट्र का रक्षण करती है। राष्ट्र के व्यक्तियों के स्वस्थ व त्यागशील [देवो दानात्] होने पर राष्ट्र कभी शत्रुओं से पराजित नहीं होता।
Essence
हम वेदोपदिष्ट ऋत के मार्ग पर चलते हुए प्रभुस्तबन, ज्ञान व शक्ति सम्भरण' को प्राप्त हों। शरीर में शक्ति का रक्षण करते हुए 'देवपूजा, संगतिकरण व दान की वृत्ति' वाले बनें। परिणामतः 'उत्तम सन्तानोंवाले, उत्तम प्राणशक्तिवाले व उत्तम राष्ट्रवाले' हों।

 
Subject
ऋतु+रतस्