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Atharvaveda - Mantra 19

Atharvaveda 8/7/19

10 Sukta
28 Mantra
8/7/19
Devata- भैषज्यम्, आयुष्यम्, ओषधिसमूहः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ओषधि समूह सूक्त
Mantra with Swara
सर्वाः॑ सम॒ग्रा ओष॑धी॒र्बोध॑न्तु॒ वच॑सो॒ मम॑। यथे॒मं पा॒रया॑मसि॒ पुरु॑षं दुरि॒तादधि॑ ॥

सर्वा॑: । स॒म्ऽअ॒ग्रा: । ओष॑धी: । बोध॑न्तु । वच॑स: । मम॑ । यथा॑ । इ॒मम् । पा॒रया॑मसि । पुरु॑षम् । दु॒:ऽइ॒तात् । अधि॑॥७.१९॥

Mantra without Swara
सर्वाः समग्रा ओषधीर्बोधन्तु वचसो मम। यथेमं पारयामसि पुरुषं दुरितादधि ॥

सर्वा: । सम्ऽअग्रा: । ओषधी: । बोधन्तु । वचस: । मम । यथा । इमम् । पारयामसि । पुरुषम् । दु:ऽइतात् । अधि॥७.१९॥

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Meaning
१. (अहम्) = मैं (याः च वीरुधः वेद) = जिन लताओं को निश्चय से जानता हूँ, (याः च) = और जिनको (चक्षुषा पश्यामि) = आँख से देखता हूँ, (अज्ञाता: च याः जानीमः) = और आज तक अज्ञात जिन ओषधियों को हम अब जानने लगे हैं, (च) = और (यासु) = जिनमें (संभृतम्) = सम्यक् भरणशक्ति को (विना) = हम जानते हैं, २. वे (सर्वा:) = सब (समग्रा:) = सम्पूर्ण 'मूल, मध्य व अग्न' भाग समेत (ओषधी:) = ओषधियौं (मम वचस:) = मेरे वचन से बोधन्तु यह समझ लें (यथा) = जिससे (इमं पुरुषम्) = इस रोग-पीड़ित पुरुष को (दुरितात् अधि पारयामसि) = दुःखप्रद रोग से-रोगजनित कष्ट से पार लगा दें। एक वैद्य ओषधियों को सम्बोधन करता हुआ कहता है कि 'इस पुरुष को अवश्य नीरोग करना हो है।
Essence
कुछ औषध हमें ज्ञात हैं, बहुत-से अज्ञात हैं। कई अज्ञात औषधों को समय प्रवाई में हम जान पाते हैं। इन सब औषधों के सम्यक् प्रयोग से रुग्ण पुरुष को रोग-कष्ट से मुक्त किया जाए।