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Atharvaveda - Mantra 18

Atharvaveda 8/7/18

10 Sukta
28 Mantra
8/7/18
Devata- भैषज्यम्, आयुष्यम्, ओषधिसमूहः Rishi- अथर्वा Chhanda- अनुष्टुप् Suktam- ओषधि समूह सूक्त
Mantra with Swara
याश्चा॒हं वेद॑ वी॒रुधो॒ याश्च॒ पश्या॑मि॒ चक्षु॑षा। अज्ञा॑ता जानी॒मश्च॒ या यासु॑ वि॒द्म च॒ संभृ॑तम् ॥

या: । च॒ । अ॒हम् । वेद॑ । वी॒रुध॑: । या: । च॒ । पश्या॑मि । चक्षु॑षा । अज्ञा॑ता: । जा॒नी॒म: । च॒ । या: । यासु॑ । वि॒द्म । च॒ । सम्ऽभृ॑तम् ॥७.१८॥

Mantra without Swara
याश्चाहं वेद वीरुधो याश्च पश्यामि चक्षुषा। अज्ञाता जानीमश्च या यासु विद्म च संभृतम् ॥

या: । च । अहम् । वेद । वीरुध: । या: । च । पश्यामि । चक्षुषा । अज्ञाता: । जानीम: । च । या: । यासु । विद्म । च । सम्ऽभृतम् ॥७.१८॥

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Meaning
१. (अहम्) = मैं (याः च वीरुधः वेद) = जिन लताओं को निश्चय से जानता हूँ, (याः च) = और जिनको (चक्षुषा पश्यामि) = आँख से देखता हूँ, (अज्ञाता: च याः जानीमः) = और आज तक अज्ञात जिन ओषधियों को हम अब जानने लगे हैं, (च) = और (यासु) = जिनमें (संभृतम्) = सम्यक् भरणशक्ति

को (विना) = हम जानते हैं, २. वे (सर्वा:) = सब (समग्रा:) = सम्पूर्ण 'मूल, मध्य व अग्न' भाग समेत (ओषधी:) = ओषधियौं (मम वचस:) = मेरे वचन से बोधन्तु यह समझ लें (यथा) = जिससे (इमं पुरुषम्) = इस रोग-पीड़ित पुरुष को (दुरितात् अधि पारयामसि) = दुःखप्रद रोग से-रोगजनित कष्ट से पार लगा दें। एक वैद्य ओषधियों को सम्बोधन करता हुआ कहता है कि 'इस पुरुष को अवश्य नीरोग करना हो है।
Essence
कुछ औषध हमें ज्ञात हैं, बहुत-से अज्ञात हैं। कई अज्ञात औषधों को समय प्रवाई में हम जान पाते हैं। इन सब औषधों के सम्यक् प्रयोग से रुग्ण पुरुष को रोग-कष्ट से मुक्त किया जाए।
Subject
औषध आनन्त्य