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Atharvaveda - Mantra 7

Atharvaveda 8/5/7

10 Sukta
22 Mantra
8/5/7
Devata- कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः Rishi- शुक्रः Chhanda- ककुम्मत्यनुष्टुप् Suktam- प्रतिसरमणि सूक्त
Mantra with Swara
ये स्रा॒क्त्यं म॒णिं जना॒ वर्मा॑णि कृ॒ण्वते॑। सूर्य॑ इव॒ दिव॑मा॒रुह्य॒ वि कृ॒त्या बा॑धते व॒शी ॥

ये । स्रा॒क्त्यम् । म॒णिम् । जना॑: । वर्मा॑णि । कृ॒ण्वते॑ । सूर्य॑:ऽइव । दिव॑म् । आ॒ऽरुह्य॑ । वि । कृ॒त्या: । बा॒ध॒ते॒ । व॒शी ॥५.७॥

Mantra without Swara
ये स्राक्त्यं मणिं जना वर्माणि कृण्वते। सूर्य इव दिवमारुह्य वि कृत्या बाधते वशी ॥

ये । स्राक्त्यम् । मणिम् । जना: । वर्माणि । कृण्वते । सूर्य:ऽइव । दिवम् । आऽरुह्य । वि । कृत्या: । बाधते । वशी ॥५.७॥

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Meaning
१. (ये) = जो (जना:) = लोग (स्त्राक्त्यम्) = तपस्या के द्वारा अपने को परिपक्व बनानेवाले लोगों में निवास करनेवाली (मणिम्) = वीर्यरूप मणि को (वर्माणि कृण्वते) = अपना कवच बनाते हैं, उनके जीवन में यह वीर्यमणि (वशी) = सब रोगादि शत्रुओं को वशीभूत करता हुआ (सूर्यः इव दिवम् आरुह्य) = सूर्य जैसे धुलोक में आरोहण करता है, उसी प्रकार मस्तिष्करूप झुलोक में आरुढ़ होकर (कृत्या:) = सब प्रकार के हिंसनों को (विबाधते) = दूर रोकनेवाला होता है। २. वीर्यरूप मणि मस्तिष्करूप धुलोक का ज्ञानसूर्य बनती है तथा शरीररूप पृथिवीलोक पर आक्रमण करनेवाले सब रोगरूप शत्रुओं को सुदूर विनष्ट करनेवाली होती है।
Essence
सुरक्षित वीर्य हमारा कवच बनता है। यह रोगरूप शत्रुओं के आक्रमण से हमें बचाता है। मस्तिष्क में यह ज्ञानसूर्य के उदय का साधन बनता है और सब छेदन-भेदन को हमसे दूर रखता है।
Subject
मणिरूप कवच