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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 8/5/4

10 Sukta
22 Mantra
8/5/4
Devata- कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः Rishi- शुक्रः Chhanda- चतुष्पदा भुरिग्जगती Suktam- प्रतिसरमणि सूक्त
Mantra with Swara
अ॒यं स्रा॒क्त्यो म॒णिः प्र॑तीव॒र्तः प्र॑तिस॒रः। ओज॑स्वान्विमृ॒धो व॒शी सो अ॒स्मान्पा॑तु स॒र्वतः॑ ॥

अ॒यम् । स्रा॒क्त्य: । म॒णि: । प्र॒ति॒ऽव॒र्त: । प्र॒ति॒ऽस॒र: । ओज॑स्वान् । वि॒ऽमृ॒ध: । व॒शी । स: । अ॒स्मान् । पा॒तु॒ । स॒र्वत॑: ॥५.४॥

Mantra without Swara
अयं स्राक्त्यो मणिः प्रतीवर्तः प्रतिसरः। ओजस्वान्विमृधो वशी सो अस्मान्पातु सर्वतः ॥

अयम् । स्राक्त्य: । मणि: । प्रतिऽवर्त: । प्रतिऽसर: । ओजस्वान् । विऽमृध: । वशी । स: । अस्मान् । पातु । सर्वत: ॥५.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अयं मणि:) = यह वीर्यरूप मणि (स्त्रावत्यः) [सै पाके, अक् गती, त्य] = तपस्या के द्वारा परिपाक की ओर गति करनेवालों में होनेवाली है। अपने को तपस्या की अग्नि में परिपक्व करनेवाला ही इसका रक्षण कर पाता है, विलासी पुरुष में इसका निवास नहीं होता। (प्रतीवर्तः) = [प्रतिकूल वर्तयति अनेन] शत्रुओं के मुख को मोड़ देनेवाला है। (प्रतिसर:) = यह वीर्य रोगरूप शत्रुओं पर धावा बोलनेवाला है। २. (ओजस्वान्) = यह हमें प्रशस्त ओजवाला बनाता है, (विमृधः) = शत्रुओं का विमर्दन करनेवाला है और (वशी) = सबको अपने वश में करनेवाला है। (स:) = वह मणि (अस्मान्) = हमें (सर्वतः पातु) = सब ओर से रक्षित करे।
Essence
यह वीर्यरूप मणि अपने को तपस्या की अग्नि में परिपक्व करनेवालों में रहती है। यह प्रतीवर्त व प्रतिसर है। यह हमें ओजस्वी बनाती है व हमारा रक्षण करती है।
Subject
स्त्राक्त्यः मणिः