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Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 8/5/3

10 Sukta
22 Mantra
8/5/3
Devata- कृत्यादूषणम् अथवा मन्त्रोक्ताः Rishi- शुक्रः Chhanda- चतुष्पदा भुरिग्जगती Suktam- प्रतिसरमणि सूक्त
Mantra with Swara
अ॒नेनेन्द्रो॑ म॒णिना॑ वृ॒त्रम॑हन्न॒नेनासु॑रा॒न्परा॑भावयन्मनी॒षी। अ॒नेना॑जय॒द्द्यावा॑पृथि॒वी उ॒भे इ॒मे अ॒नेना॑जयत्प्र॒दिश॒श्चत॑स्रः ॥

अ॒नेन॑ । इन्द्र॑: । म॒णिना॑ । वृ॒त्रम् । अ॒ह॒न् । अ॒नेन॑ । असु॑रान् । परा॑ । अ॒भा॒व॒य॒त् । म॒नी॒षी । अ॒नेन॑ । अ॒ज॒य॒त् । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । उ॒भे इति॑ । इ॒मे इति॑ । अ॒नेन॑ । अ॒ज॒य॒त् । प्र॒ऽदिश॑: । चत॑स्र: ॥५.३॥

Mantra without Swara
अनेनेन्द्रो मणिना वृत्रमहन्ननेनासुरान्पराभावयन्मनीषी। अनेनाजयद्द्यावापृथिवी उभे इमे अनेनाजयत्प्रदिशश्चतस्रः ॥

अनेन । इन्द्र: । मणिना । वृत्रम् । अहन् । अनेन । असुरान् । परा । अभावयत् । मनीषी । अनेन । अजयत् । द्यावापृथिवी इति । उभे इति । इमे इति । अनेन । अजयत् । प्रऽदिश: । चतस्र: ॥५.३॥

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Meaning
१. (इन्द्रः) = जितेन्द्रिय पुरुष (अनेन मणिना) = इस वीर्यरूप मणि के द्वारा (वृत्रम् अहन्) = ज्ञान पर आ जानेवाले 'काम' रूप आवरण को नष्ट करता है। सुरक्षित वीर्य ज्ञानाग्नि का इंधन बनता है और दीस ज्ञानाग्नि से काम का दहन होता है। (मनीषी) = वीर्यरक्षण द्वारा सूक्ष्म बुद्धि को प्राप्त मनुष्य (अनेन) = इस वीर्यरूप मणि के द्वारा ही (असुरान्) = सब आसुरवृत्तियों को (परा अभावयत्) = सुदूर पराभूत करनेवाला होता है। २. (अनेन) = इसके द्वारा ही (इमे उभे द्यावापृथिवी) = इन दोनों द्यावापृथिवी को मस्तिष्करूप द्युलोक व शरीररूप पृथिवी को (अजयत्) = जीतता है, मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त बनाता है तो शरीर को सशक्त करता है। (अनेन) = इस वीर्यरूप मणि के द्वारा (चतस्त्रः प्रदिश:) = चारों दिशाओं और उपदिशाओं को अजयत्-जीतनेवाला होता है। सब दिशाओं में इस वीर्यवान् पुरुष की शोभा होती है।
Essence
जितेन्द्रिय पुरुष वीर्यरक्षण द्वारा ज्ञानाग्नि को दीप्त करके उससे काम का विध्वंस करता है, सब आसुरीभावों को पराभूत करता है, मस्तिष्क को ज्ञानदीस व शरीर को सशक्त बनाता है और सब दिशाओं में शोभावाला होता है।
Subject
वृत्र-विनाश व असुर पराभव