Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 17

Atharvaveda 8/4/17

10 Sukta
25 Mantra
8/4/17
Devata- इन्द्रासोमौ, अर्यमा Rishi- चातनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुदमन सूक्त
Mantra with Swara
प्र या जिगा॑ति ख॒र्गले॑व॒ नक्त॒मप॑ द्रु॒हुस्त॒न्वं गूह॑माना। व॒व्रम॑न॒न्तमव॒ सा प॑दीष्ट॒ ग्रावा॑णो घ्नन्तु र॒क्षस॑ उप॒ब्दैः ॥

प्र । या । जिगा॑ति । ख॒र्गला॑ऽइव । नक्त॑म् । अप॑ । द्रु॒हु: । त॒न्व᳡म् । गूह॑माना । व॒व्रम् । अ॒न॒न्तम् । अव॑ । सा । प॒दी॒ष्ट॒ । ग्रावा॑ण: । घ्न॒न्तु॒ । र॒क्षस॑: । उ॒प॒ब्दै: ॥४.१७॥

Mantra without Swara
प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहुस्तन्वं गूहमाना। वव्रमनन्तमव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः ॥

प्र । या । जिगाति । खर्गलाऽइव । नक्तम् । अप । द्रुहु: । तन्वम् । गूहमाना । वव्रम् । अनन्तम् । अव । सा । पदीष्ट । ग्रावाण: । घ्नन्तु । रक्षस: । उपब्दै: ॥४.१७॥

Meaning
१. (या) = जो (खर्गला इव) = उलूकी के समान (नक्तम्) = रात्रि में (द्रुहु:) = पति के प्रति द्रोह की वृत्तिवाली होती हुई (तन्वं गूहमाना) = अपने शरीर को छिपाती हुई, अर्थात् चुपके-चुपके छदावेष में (अप प्रजिगाति) = घर से बाहर जाती हैं, अर्थात् व्यभिचारिणी [जारिणी] के समान आचरण करती है, (सा) = वह (अनन्तं वव्रम्) = अनन्त गहरे गड्डे को अवपदीष्ट जानेवाली हो-नरक-कुण्डों में गिरनेवाली हो। २. (ग्रावाण:) = उपदेष्टा लोग उपब्दैः ज्ञान के शब्दों से इन (रक्षस:) = राक्षसी वृत्तिवाले लोगों को (न्घन्तु) = प्राप्त हों [हन् गती] और इनके राक्षसीभावों को विनष्ट करें।
Essence
व्यभिचार द्वारा पति के जीवन को कड़वा करनेवाली स्त्री अनन्त गड्डों में गिरनेवालो हो। ज्ञानोपदेष्टा ज्ञान के शब्दों द्वारा इसकी इन बुरी वृत्तियों को विनष्ट करें।



 
Subject
व्यभिचारिणी का दण्ड

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.