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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 8/3/13

10 Sukta
26 Mantra
8/3/13
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
परा॑ शृणीहि॒ तप॑सा यातु॒धाना॒न्परा॑ग्ने॒ रक्षो॒ हर॑सा शृणीहि। परा॒र्चिषा॒ मूर॑देवाञ्छृणीहि॒ परा॑सु॒तृपः॒ शोशु॑चतः शृणीहि ॥

परा॑ । शृ॒णी॒हि॒ । तप॑सा । या॒तु॒ऽधाना॑न् । परा॑ । अ॒ग्ने॒ । रक्ष॑: । हर॑सा । शृ॒णी॒हि॒ । परा॑ । अ॒र्चिषा॑ । मूर॑ऽदेवान् । शृ॒णी॒हि॒ । परा॑ । अ॒सु॒ऽतृप॑: । शोशु॑चत: । शृ॒णी॒हि॒ ॥३.१३॥

Mantra without Swara
परा शृणीहि तपसा यातुधानान्पराग्ने रक्षो हरसा शृणीहि। परार्चिषा मूरदेवाञ्छृणीहि परासुतृपः शोशुचतः शृणीहि ॥

परा । शृणीहि । तपसा । यातुऽधानान् । परा । अग्ने । रक्ष: । हरसा । शृणीहि । परा । अर्चिषा । मूरऽदेवान् । शृणीहि । परा । असुऽतृप: । शोशुचत: । शृणीहि ॥३.१३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (तपसा) = तप के द्वारा (यातुधानान्) = पीड़ा देनेवालों को (पराशृणीहि) = दूर विनष्ट कर । जिस समय जीवन में तप की कमी आ जाती है तब भोगवृत्ति बढ़ जाती है, उसी समय मनुष्य औरों को पीड़ित करनेवाला बनता है। यदि प्रजा में तपस्या की भावना बनी रहे तो उनके जीवनों में यातुधानत्व' आता ही नहीं। हे अने-राजन्! आप हरसा-[ज्वलितेन तेजसा-द०] तेजस्विता के द्वारा रक्ष:-राक्षसीवृत्तिवालों को (पराशृणीहि) = सुदूर विनष्ट करनेवाले होओ। तेजस्विता अशुभ वृत्तियों को विनष्ट करनेवाली है। २. अर्चिषा-ज्ञान की ज्वाला से मूरदेवान् मूर्खतापूर्ण व्यवहार करनेवालों को पराशृणीहि-विनष्ट कीजिए। ज्ञान-प्रसार के द्वारा मूर्खता के नष्ट होने पर सब व्यवहार विवेक व सभ्यता के साथ होने लगते हैं। असुतपः केवल अपने प्राणों को तृप्त करने में लगे हुए शोशुचत:-[to burn, consume] औरों के शोक का कारण बनते हुए इन लोगों को तू पराशृणीहि-सुदूर विनष्ट कर।
Essence
जीवन में तपस्या के द्वारा यातुधानत्व का विनाश हो, तेजस्विता से राक्षसीवृत्ति का विलोप हो और ज्ञान-प्रसार के द्वारा 'मूर्खतापूर्ण व्यवहार तथा केवल अपने को तृस करने की वृत्ति' का-स्वार्थ का विलोप हो।

 
Subject
'तप, तेज व ज्योति' से पाप दूर करना