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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 8/3/1

10 Sukta
26 Mantra
8/3/1
Devata- अग्निः Rishi- चातनः Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- शत्रुनाशन सूक्त
Mantra with Swara
रक्षो॒हणं॑ वा॒जिन॒मा जि॑घर्मि मि॒त्रं प्रथि॑ष्ठ॒मुप॑ यामि॒ शर्म॑। शिशा॑नो अ॒ग्निः क्रतु॑भिः॒ समि॑द्धः॒ स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म् ॥

र॒क्ष॒:ऽहन॑म् । वा॒जिन॑म् । आ । जि॒घ॒र्मि॒ । मि॒त्रम् । प्रथि॑ष्ठम् । उप॑ । या॒मि॒ । शर्म॑ । शिशा॑न: । अ॒ग्नि: । क्रतु॑ऽभि: । सम्ऽइ॑ध्द: । स: । न॒: । दिवा॑ । स: । रि॒ष: । पा॒तु॒ । नक्त॑म् ॥३.१॥

Mantra without Swara
रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म। शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम् ॥

रक्ष:ऽहनम् । वाजिनम् । आ । जिघर्मि । मित्रम् । प्रथिष्ठम् । उप । यामि । शर्म । शिशान: । अग्नि: । क्रतुऽभि: । सम्ऽइध्द: । स: । न: । दिवा । स: । रिष: । पातु । नक्तम् ॥३.१॥

Meaning
१. (रक्षोहणम्) = राक्षसी भावों को नष्ट करनेवाले, (वाजिनम्) = प्रशस्त बलवाले उस प्रभु को (आजिघर्मि) = अपने हृदयदेश में दीस करता हूँ तथा (मित्रम्) = सबको मृत्यु व पाप से बचानेवाले अनिशायित विस्तारवाले-सर्वव्यापक उस प्रभु की (शर्म उपयामि) = शरण में जाता है। २. (सः अग्निः) = वह अग्नणी प्रभु (क्रतुभिः समिद्धः) = यज्ञादि कर्मों से हृदयदेश में दीप्स किया हुआ (शिशान:) = हमारी बुद्धियों को तीक्ष्ण करनेवाला है। ये बुद्धियाँ ही तो हमारे कर्मों को पवित्र करनेवाली होंगी। (स:) = वे प्रभु (न:) = हमें (दिवा) = दिन में तथा (नक्तम्) = रात्रि में (रिष:) = हिंसक तत्त्वों से (पातु) = बचाएँ। प्रभु सदा हमारा रक्षण करनेवाले हों। प्रभु से रक्षित हुए-हुए हम तीव्र बुद्धिवाले और यज्ञादि पवित्र कर्मोंवाले बनें।
Essence
हम प्रभु को हदयदेश में समिद्ध करें। उत्तम कर्मों में लगे हुए प्रभ के प्रिय बनें। प्रभु से दीस बुद्धि पाकर हम दिन-रात अपना रक्षण कर पाएँ।
Subject
शिशानः अग्निः

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