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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 8/2/9

10 Sukta
28 Mantra
8/2/9
Devata- आयुः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- पञ्चपदा जगती Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
दे॒वानां॑ हे॒तिः परि॑ त्वा वृणक्तु पा॒रया॑मि त्वा॒ रज॑स॒ उत्त्वा॑ मृ॒त्योर॑पीपरम्। आ॒राद॒ग्निं क्र॒व्यादं॑ नि॒रूहं॑ जी॒वात॑वे ते परि॒धिं द॑धामि ॥

दे॒वाना॑म् । हे॒ति: । परि॑ । त्वा॒ । वृ॒ण॒क्तु॒ । पा॒रया॑मि । त्वा॒ । रज॑स: । उत् । त्वा॒ । मृ॒त्यो: । अ॒पी॒प॒र॒म् । आ॒रात् । अ॒ग्निम् । क्र॒व्य॒ऽअद॑म् । नि॒:ऽऊह॑न् । जी॒वात॑वे । ते॒ । प॒रि॒ऽधिम् । द॒धा॒मि॒ ॥२.९॥

Mantra without Swara
देवानां हेतिः परि त्वा वृणक्तु पारयामि त्वा रजस उत्त्वा मृत्योरपीपरम्। आरादग्निं क्रव्यादं निरूहं जीवातवे ते परिधिं दधामि ॥

देवानाम् । हेति: । परि । त्वा । वृणक्तु । पारयामि । त्वा । रजस: । उत् । त्वा । मृत्यो: । अपीपरम् । आरात् । अग्निम् । क्रव्यऽअदम् । नि:ऽऊहन् । जीवातवे । ते । परिऽधिम् । दधामि ॥२.९॥

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Meaning
१. (देवानां हेति:) = देवों का अस्त्र (त्वा परिवृणक्तु) = तुझे दूर से छोड़ जाए-तेरी हिंसा करनेवाला न हो। मैं (त्वा) = तुझे (रजसः पारयामि) = रजोगुण से पार करता हूँ। तृष्णा से ऊपर उठा हुआ तू पाप-मार्ग की ओर नहीं जाता उत्-और (त्वा) = तुझे (मृत्योः अपीपरम्) = मृत्यु से भी पार करता हैं, बचाता हूँ। पाप ही तो मृत्यु का कारण बनता है। २. मैं (क्रव्यादं अग्निम्) = कच्चा मांस खा जानेवाले कामाग्नि को (आरात् निरूहम्) = सुदूर प्राप्त कराता हूँ-तुझसे बहुत दूर फेंकता हूँ। (ते जीवातवे) = तेरे जीवन के लिए (परिधिं दधामि) = प्राकार की स्थापना करता हूँ-मर्यादा की स्थापना करता हूँ। मर्यादा ही वह प्राकार है जो हमें मृत्यु से बचाता है।
Essence
हमें सूर्यादि देवों की अनुकूलता प्राप्त हो तथा हम राजस् वृत्तियों से ऊपर उठकर नीरोग जीवनवाले हों, हम कामाग्नि से न जलाये जाएँ, दीर्घजीवन के लिए मर्यादारूप प्राकार के द्वारा हम जीवन को सुरक्षित करें।
Subject
परिधि