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Atharvaveda - Mantra 13

Atharvaveda 8/1/13

10 Sukta
21 Mantra
8/1/13
Devata- आयु Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिपदा भुरिङ्महाबृहती Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
बो॒धश्च॑ त्वा प्रतीबो॒धश्च॑ रक्षतामस्व॒प्नश्च॑ त्वानवद्रा॒णश्च॑ रक्षताम्। गो॑पा॒यंश्च॑ त्वा॒ जागृ॑विश्च रक्षताम् ॥

बो॒ध: । च॒ । त्वा॒ । प्र॒ति॒ऽबो॒ध: । च॒ । र॒क्ष॒ता॒म् । अ॒स्व॒प्न: । च॒ । त्वा॒ । अ॒न॒व॒ऽद्रा॒ण: । च॒ । र॒क्ष॒ता॒म् । गो॒पा॒यन् । च॒ । त्वा॒ । जागृ॑वि: । च॒ । र॒क्ष॒ता॒म् ॥१.१३॥

Mantra without Swara
बोधश्च त्वा प्रतीबोधश्च रक्षतामस्वप्नश्च त्वानवद्राणश्च रक्षताम्। गोपायंश्च त्वा जागृविश्च रक्षताम् ॥

बोध: । च । त्वा । प्रतिऽबोध: । च । रक्षताम् । अस्वप्न: । च । त्वा । अनवऽद्राण: । च । रक्षताम् । गोपायन् । च । त्वा । जागृवि: । च । रक्षताम् ॥१.१३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (बोधः च प्रतिबोध: च) = बोध और प्रतिबोध (त्वा रक्षताम्) = तेरा रक्षण करें। वस्तुओं का ज्ञान 'बोध' कहाता है और प्रत्येक वस्तु में प्रभु की महिमा का ज्ञान 'प्रतिबोध' शब्द से कहा जाता है। जब हम किसी भी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करते हैं, उस समय उसकी रचना व गुणों में विचित्रता देखते हुए हमें प्रभु की महिमा का भी स्मरण होता है। ऐसा होने पर हम उस वस्तु का ठीक ही प्रयोग करते हैं, उसका अयोग ब अतियोग न करके ठीक ही योग करनेवाले बनते हैं। यह यथायोग ही हमारा रक्षण करता है। २. (अस्वप्न: च) = न सो जाना (अनवद्राण: च) = और कुटिल गतिवाला न होना-ये भी (त्वा रक्षताम्) = तेरा रक्षण करें। हम सो न जाएँ, साथ ही गति को कुटिल भी न होने दें। 'सो जाना' तामसी बृत्ति है, 'कुटिलगति' राजसी वृत्ति है। इनसे ऊपर उठकर हम सात्त्विकी वृत्तिवाले बनें। यही वृत्ति हमारा रक्षण करती है। ३. (गोपायन् च) = शरीर का रक्षण करता हुआ यह सात्त्विकभाव (च) = तथा (जागृवि:) =  जागरित रहना-प्रमादी होकर कर्तव्य-कर्मों से विमुख नहीं होना-ये दोनों भाव भी (त्वा रक्षताम्) = तेरा रक्षण करें। हम जीवन-यात्रा में सदा अपना रक्षण करनेवाले तथा नीरोग बनें, जागते हुए रहें, जिससे कामादि शत्रुओं के शिकार न हो जाएँ।
Essence
'बोध-प्रतिबोध', 'अस्वप्न-अनवद्राण' तथा 'गोपायन और जाग्रवि' हमारा रक्षण करें। ये क्रमश: 'प्राणापान, मन, बुद्धि और चक्षुईय' के अभिमानी देव हैं। ये हमारा रक्षण करें।
Subject
षड् देवाः