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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 8/1/10

10 Sukta
21 Mantra
8/1/10
Devata- आयुः Rishi- ब्रह्मा Chhanda- त्रिष्टुप् Suktam- दीर्घायु सूक्त
Mantra with Swara
मैतं पन्था॒मनु॑ गा भी॒म ए॒ष येन॒ पूर्वं॒ नेयथ॒ तं ब्र॑वीमि। तम॑ ए॒तत्पु॑रुष॒ मा प्र प॑त्था भ॒यं प॒रस्ता॒दभ॑यं ते अ॒र्वाक् ॥

मा । ए॒तम् । पन्था॑म् । अनु॑ । गा॒: । भी॒म: । ए॒ष: । येन॑ । पूर्व॑म् । न । इ॒यथ॑ । तम् । ब्र॒वी॒मि॒ । तम॑: । ए॒तत् । पु॒रु॒ष॒ । मा । प्र । प॒त्था॒: । भ॒यम् । प॒रस्ता॑त् । अभ॑यम् । ते॒ । अ॒र्वाक् ॥१.१०॥

Mantra without Swara
मैतं पन्थामनु गा भीम एष येन पूर्वं नेयथ तं ब्रवीमि। तम एतत्पुरुष मा प्र पत्था भयं परस्तादभयं ते अर्वाक् ॥

मा । एतम् । पन्थाम् । अनु । गा: । भीम: । एष: । येन । पूर्वम् । न । इयथ । तम् । ब्रवीमि । तम: । एतत् । पुरुष । मा । प्र । पत्था: । भयम् । परस्तात् । अभयम् । ते । अर्वाक् ॥१.१०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे पुरुष! (एतं पन्थाम् मा अनुगा:) = इस मार्ग के पीछे मत जा, जिससे कि मृत जाते हैं। (एषः भीम:) = यह गये हुओं का स्मरण करते रहने का मार्ग भंयकर है। मृतों का ही शोक करते रहना ठीक नहीं। इस मार्ग पर जाने के निषेध के द्वारा मैं तुझे (तं ब्रवीमि) = उस मार्ग का उपदेश करता है, (येन पूर्व न इयथ) = जिससे मृत्युकाल से पूर्व तू नहीं जाता है। मरों का ही शोक करता रहेगा तो समय से पहले जाएगा ही। २. एतत्-यह मरे हुओं का ही शोक करते रहना तो तमः अन्धकार है-अज्ञान है। मा प्रपत्था: इसकी ओर मत जा। परस्तात्-परे, अर्थात् इहलोक के कर्तव्यों में ध्यान देकर गये हुओं का शोक करते रहने में तो (भयम्) = भय-ही-भय है। अर्वाक्-हम सबके सम्मुख आने में ही (अभयम्) = निर्भयता है । कल्याण इसी बात में है कि तू शोक को छोड़कर जीवितों के सम्मुख प्रास हो और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कर।
Essence
-गये हुओं का ही शोक करते रहना और अपने कर्तव्यों में प्रमाद करना भयान्वित मार्ग है। यह तो हमें समय से पूर्व ही मृत्यु-मुख में ले जाएगा।
Subject
परस्तात् भर्य, अर्वाक् अभयम्