Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/99/1

118 Sukta
1 Mantra
7/99/1
Devata- वेदिः Rishi- अथर्वा Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Suktam- वेदी सूक्त
Mantra with Swara
परि॑ स्तृणीहि॒ परि॑ धेहि॒ वेदिं॒ मा जा॒मिं मो॑षीरमु॒या शया॑नाम्। हो॑तृ॒षद॑नं॒ हरि॑तं हिर॒ण्ययं॑ नि॒ष्का ए॒ते यज॑मानस्य लो॒के ॥

परि॑ । स्तृ॒णी॒हि॒ । परि॑ । धे॒हि॒ । वेदि॑म् । मा । जा॒मिम् । मो॒षी॒: । अ॒मु॒या । शया॑नाम् । हो॒तृ॒ऽसद॑नम् । हरि॑तम् । हि॒र॒ण्यय॑म् । नि॒ष्का: । ए॒ते । यज॑मानस्‍य । लो॒के ॥१०४.१॥

Mantra without Swara
परि स्तृणीहि परि धेहि वेदिं मा जामिं मोषीरमुया शयानाम्। होतृषदनं हरितं हिरण्ययं निष्का एते यजमानस्य लोके ॥

परि । स्तृणीहि । परि । धेहि । वेदिम् । मा । जामिम् । मोषी: । अमुया । शयानाम् । होतृऽसदनम् । हरितम् । हिरण्ययम् । निष्का: । एते । यजमानस्‍य । लोके ॥१०४.१॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१.हे दर्भ! (परिस्तृणीहि) = तू वेदि के चारों ओर आस्तीर्ण हो, (वेदिं परिधेहि) = वेदि को समन्तात् धारण करनेवाला बन। यज्ञवेदि के चारों ओर शाहल प्रदेश हो। (अमुया शयानाम्) = इस वेदि के साथ निवास करनेवाली (जामिम्) = [जायते अस्यां प्रजा इति] यजमान पत्नी को (मा मोषी) = मत हिसित कर । यज्ञशील पत्नी का घर रोग आदि से आक्रान्त न हो। २. (होतृषदनम्) = होता का घर, यज्ञशील पुरुष का घर (हरितम्) = [हरिद्वर्ण] हराभरा अथवा दुःखों का हरण करनेवाला तथा (हिरण्ययम्) = ज्योतिर्मय होता है। वस्तुतः (एते) = ये यज्ञवेदि के चारों ओर आस्तीर्यमाण दर्भ (यजमानस्य लोके) = इस यज्ञशील पुरुष के घर में (निष्का:) = स्वर्णमय अलंकार होते हैं, अर्थात् यजमान का घर धन-धान्य से पूर्ण होता है।
Essence
शाहल प्रदेश से आवृत यज्ञवेदि घर की शोभा है। यज्ञशीला गृहपत्नी घर को कभी रोगादि से हिंसित होता हुआ नहीं पाती। यज्ञमय गृह 'दुःखरहित, प्रकाशमय व धन-धान्य से पूर्ण' बनता है।

यज्ञों में व्याप्त जीवनवाला यह व्यक्ति 'यम'-संयत जीवनवाला बनता है। इसे कभी अशुभ स्वप्न नहीं आते। यह यम अगले दोनों सूक्तों का ऋषि है।
Subject
अलंकृत यज्ञवेदि