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Atharvaveda - Mantra 2

Atharvaveda 7/90/2

118 Sukta
3 Mantra
7/90/2
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- विराट्पुरस्ताद्बृहती Suktam- शत्रुबलनाशन सूक्त
Mantra with Swara
व॒यं तद॑स्य॒ सम्भृ॑तं॒ वस्विन्द्रे॑ण॒ वि भ॑जामहै। म्ला॒पया॑मि भ्र॒जः शि॒भ्रं वरु॑णस्य व्र॒तेन॑ ते ॥

व॒यम् । तत् । अ॒स्य॒ । सम्ऽभृ॑तम् । वसु॑ । इन्द्रे॑ण । वि । भ॒जा॒म॒है॒ । म्ला॒पया॑मि । भ्र॒ज: । शि॒भ्रम् । वरु॑णस्य । व्र॒तेन॑ । ते॒ ॥९५.२॥

Mantra without Swara
वयं तदस्य सम्भृतं वस्विन्द्रेण वि भजामहै। म्लापयामि भ्रजः शिभ्रं वरुणस्य व्रतेन ते ॥

वयम् । तत् । अस्य । सम्ऽभृतम् । वसु । इन्द्रेण । वि । भजामहै । म्लापयामि । भ्रज: । शिभ्रम् । वरुणस्य । व्रतेन । ते ॥९५.२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (अस्य) = इस पुरोवर्ती शत्रुभूत जार के (संभृतं तत् वसु) = एकत्र किये हुए उस धन को (वयम्) = हम (इन्द्रेण विभजामहै) = शत्रुविद्रावक राजा के साथ विभक्त करते हैं। इस धन का एकभाग राजकोष को जाता है और दूसरा भाग जार से पीड़ित परिवार को प्राप्त होता है। २. हे जार! (ते) = तेरे (भज:) = दीप्त तेज को तथा (शिभम्) = [शीभृ कत्थने] आत्मश्लाषा को, (वरुणस्य व्रतेन) = पाप-निवारक देव के कर्म से-पापों को रोकनेवाले राजा की शासनव्यवस्था से (म्लापयामि) = क्षीण करता हूँ।
Essence
राजा जार के धन का अपहरण करके आधा राजकोश में तथा आधा पीड़ित परिवार की सहायता के लिए दे दे। वह उचित दण्ड के द्वारा इस जार के तेज व घमण्ड को नष्ट करनेवाला हो।
Subject
दास के वसु का विभाजन