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Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 7/90/1

118 Sukta
3 Mantra
7/90/1
Devata- मन्त्रोक्ताः Rishi- अङ्गिराः Chhanda- गायत्री Suktam- शत्रुबलनाशन सूक्त
Mantra with Swara
अपि॑ वृश्च पुराण॒वद्व्र॒तते॑रिव गुष्पि॒तम्। ओजो॑ दा॒स्यस्य॑ दम्भय ॥

अपि॑ । वृ॒श्च॒ । पु॒रा॒ण॒ऽवत् । व्र॒तते॑:ऽइव । गु॒ष्पि॒तम् । ओज॑: । दा॒सस्य॑ । द॒म्भ॒य॒ ॥९५.१॥

Mantra without Swara
अपि वृश्च पुराणवद्व्रततेरिव गुष्पितम्। ओजो दास्यस्य दम्भय ॥

अपि । वृश्च । पुराणऽवत् । व्रतते:ऽइव । गुष्पितम् । ओज: । दासस्य । दम्भय ॥९५.१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे अग्ने! [प्रभो अथवा राजन्!] (व्रतते:) = किसी बेल की (पुराणवत्) -= पुरानी (गुष्पितम्) = झाड़ झंकाड़-सी बनी हुई सूखी डालियों को जिस प्रकार माली खोज-खोजकर काट डालता है, उसी प्रकार आप (दासस्य) = [दस् उपक्षये] औरों का उपक्षय करनेवालों में सर्वाग्रणी पुरुष को [दासेषु उत्तम: दास्यः] (अपिवृश्च) = छिन्नांग कर डाल, इसप्रकार (ओज: दम्भय) = इसके ओज को विनष्ट कर दे।
Essence
राजा का कर्तव्य है कि राष्ट्र में दुष्ट पुरुषों को इसप्रकार छिन्नांग कर दे जैसेकि माली बेलों की सूखी, पुरानी डालियों को काट डालता है। राजा औरों का उपक्षय करनेवाले के ओज को विनष्ट कर दे।
Subject
दास के ओज का दम्भन